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भक्ति शक्ति युक्ति आगार...

कौनो घनघोर मजबूरी में घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में सुनसान सड़क पर एकदम अकेले कहीं चलल जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर और टिटही अपना तान राग छेडले स्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न
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सांसरिक चतुराई तो हर कोई सीख लेता है-हिन्दू धर्म सन्देश

लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव। जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि लिखना, पढ़ना चतुराई करना यह तो संसार की सामन्य बातें हैं। जिस परमात्मा का नाम पढ़कर समझना चाहिये उसे कोई नहीं मानता। ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी
 
दीपक भारतदीप
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विद्वान करता है एक साथ सैंकड़ों शिकार-हिन्दू धर्म संदेश

पश्यदिभ्र्दूरतोऽप्रायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः। भवन्ति हि फलायव विद्वादभ्श्वन्तिताः क्रिया।। हिन्दी में भावार्थ- विद्वान तो दूर से विपत्तियों को आता देखकर पहले ही से उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान कर लेता है और इसी कारण अपनी क्रिया से उसका सामना करता है। अशि
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विदुर नीति-अधिक धन होने पर भी अनुशासन रखना जरूरी (dhan aur anushasan-hindu dharam sandesh)

धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः। श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।। हिन्दी में भावार्थ- नीति विशारद विदुर के कथनानुसार जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर वाणी-निंदक तो नकटा होता है (nindak bura hota hai-sant kabir vani)

निन्दक ते कुत्ता भला, हट कर मांडे शर कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार।। संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि निन्दक से कुत्ता भला है जो दूर होकर भौंकता है। इतना ही नहीं कुत्ते से बुरा वह क्रोधी व्यक्ति है जो अपने गुरु को अपने आचरण के कारण गाली
 
दीपक भारतदीप
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भर्तृहरि शतक-अपना लक्ष्य बीच में नहीं छोड़ें (hindu dharm sandesh-apna lakshya

रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्। सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।। हिन्दी में भावार्थ- समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुअ और
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य नीति-कुछ पुरुषों में भी विवेक नहीं होता (purush aur vivek-chankya niti)

मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।। हिंदी में भावार्थ- दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति
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चाणक्य नीति-स्नेह करना दु:ख का मूल कारण (sneh dukh ka karan-chankya niti in hindi

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्। स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।। हिंदी में भावार्थ- जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है। सत्यं
 
दीपक भारतदीप
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रहीम के दोहे-मैंढक जब बोलें तो कोयल चुप हो जाती (koyal ki khamoshi-rahim ke dohe)

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन। अब दादुर वक्ता भए, हम को पूछत कौन। कविवर रहीम कहते हैं कि जब वर्षा का मौसम आता है तब कोयल मौन धारण कर लेती है क्योंकि उस समय मैंढक बोलने लगते हैं। वह यह सोचकर खामोश हो जाती है कि अब इस टर्र टर्र की आवाज में उसकी बात
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मनुस्मुति-घर में किसी प्रकार का अभाव न होने दें (ghar ki nari ka samman-manu smriti)

शोचन्ति जामयो यत्र विनशत्याशु तत्कुलम्। न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।। हिंदी में भावार्थ- उस परिवार का शीघ्र नाश हो जाता है जिसकी स्त्रियां दुःख या अभाव के फलस्वरूप परेशान रहती हैं। जहां स्त्रियां इस दुःख से परे होती हैं वह हमेशा घर परिवा
 
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भर्तृहरि शतक-क्षमा हो तो कवच और क्रोध हो तो शत्रु की क्या आवश्यकता (kshama aur krodh-hindu adhyatmik sandesh)

क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्। किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।। हिंदी में भावार्थ- यदि क्षमा हो तो किसी
 
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रहीम के दोहे-पानी निभाता है दूध से मित्रता (milk and water-rahim ke dohe)

जलहि मिलाइ रहीम ज्यों, कयों आपु सग छीर अगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर।। भावार्थ- कविवर रहीम कहते हैं कि दूध अपने साथ पानी को मिलाकर अंतरंग बना लेता है। जब आग की आंच आती है तो पानी अपना साथ निभाते हुए दूध को तब तक बचाता है जब तक स्वयं स्वाह नहीं
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संत कबीर वाणी-धर्म का मर्म कौन जानता है (kabir das ke dohe in hindi)

कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना। आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।। संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते ह
 
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रहीम संदेश-मतलब का प्यार कम होने लगता है (matlab ka pyar-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते हैं कि ----------------- वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। ज
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संत कबीर वाणी-चतुराई सीखने से भी क्या लाभ? (sant kabir vani in hindi)

चतुराई क्या कीजिये, जो नहिं शब्द समाय कोटिक गुन सूवा पढै, अंत बिलाई खाय संत शिरोमणि कबीर दासजी कहते हैं कि उस चतुरता से क्या लाभ? जब सतगुरु के ज्ञान-उपदेश के निर्णय और शब्द भी हृदय में नहीं समाते और उस प्रवचन का भी फिर क्या लाभ हुआ। जैसे करोड़ों गुणो
 
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मनु स्मृति-मन पर काबू करने से लक्ष्य प्राप्ति संभव (hindi adhyatm sandesh-manu smriti)

नीति विशारद मनु कहते हैं कि ---------------------------- वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा। सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।। हिंदी में भावार्थ- मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ
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भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति कभी व्यापार की तरह न करें (bhakti aur vyapar-bhartrihari shatak in hindi)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि ------------------------------ कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः। मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।। हिंदी
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विदुर नीति-दूसरे लोगों के घरों में झगड़ा न करायें (vidur niti in hindi)

मद्यपापनं कलहं पुगवैरं भार्यापत्योरंतरं ज्ञातिभेदम्। राजद्विष्टं स्त्रीपुंसयोर्विवादं वज्र्यान्याहुवैश्चं पन्थाः प्रदुष्टः।। हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद विदुर कहते हैं कि शराब पीना, कलह करना, अपने समूह के साथ शत्रुता, पति पत्नी और परिवार में भेद उ
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विदुर नीति-मतिमान और गतिमान को सहारा देने वाले ही संत

गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एवं सतां गतिः। असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः।। हिंदी में भावार्थ- मतिमान और गतिमान पुरुषों को सहारा देने वाले संत हैं। संतों को भी सहारा देने वाले संत हैं। असत्य पुरुषों को भी संत सहारा देते हैं पर दुष्ट लोग किसी को
 
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संत कबीर वाणी-हीरे की जौहरी और शब्द की परख साधु को होती (heera aur shabd-sant kabir vani)

हीरा न तहां न खोलिए, जहं खोटी है हाट। कसि करि बांधो गांठरी, उठि करि चालो बाट।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हीरे को उस बाजार में मत खोलिए जहां खोटी नीयत वाले उपस्थित हैं। उसे तो अपनी गांठ में कसकर अपनी राह चल दीजिए। हीरा परखै जौहरी, शब्दहि
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चाणक्य नीति-आँख से देखकर ज़मीन पर पाँव रखें (chankya darshan-hindi sandesh)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि ------------------------- धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः। विद्यारत्नेद यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुष।। हिंदी में भावार्थ- धन से रहित व्यक्ति को दीन हीन नहीं समझना चाहिये अगर वह विद्या ये युक्त है। जिस व्यक्ति के पास धन औ
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कौटिल्य दर्शन-कभी कछुआ तो कभी साँप बन जाएँ (kautilya niti-kabhi saanp kabhi kashuaa bane)

मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः। अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।। हिंदी में भावार्थ- बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जा
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मनु स्मृति-अध्ययन में सुस्ती नहीं करें (manu smriti-shiksha aur susti)

अध्येयष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः। ‘अधीष्व भो! इति ब्रुयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत्।। हिंदी में भावार्थ-शिष्य को पढ़ाने के विषय में गुरु को कभी भी आलस नहीं बरतना चाहिये। इसके अलावा बेमन से भी अध्यापन का कार्य करना उचित नहीं है। अध्यापन प्रारंभ करने
 
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विदुर नीति-अमीर रिश्तेदार के पास जाकर बेकार में दुःख पाना (vidur niti-amir ke pas jana)

ज्ञातयस्यतारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च। सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वंतत्ता मज्ज्यन्ति च।। हिंदी में भावार्थ-इस संसार में अपने ही जाति बंधु जीवन की नैया पार भी लगाते हैं तो डुबोते भी है। जो सदाचारी है वह तो तारने के लिये तत्पर रहते हैं और जो दुराचारी है वह
 
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भर्तृहरि नीति शतक-रोजी पाने वाले से प्रणाम पाकर आदमी को अंहकार का बुखार चढ़ जाता है (ahankar ka bukhar-adhyatmik sandesh)

स जातः कोऽप्यासीनमदनरिमुणा मूध्निं धवलं कपालं यस्योच्चैर्विनहितमलंकारविधये। नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमद्धिः कः पुंसामयमतुलदर्प ज्वर भरः। हिंदी में भावार्थ- महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि भगवान शिव ने अपने अनेक खोपड़ियों की माला सजाकर अपने
 
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विदुर नीति-धनी बंधू के पास जाकर कष्ट न पाना

ज्ञातयस्यतारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च। सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वंतत्ता मज्ज्यन्ति च।। हिंदी में भावार्थ- इस संसार में अपने ही जाति बंधु जीवन की नैया पार भी लगाते हैं तो डुबोते भी है। जो सदाचारी है वह तो तारने के लिये तत्पर रहते हैं और जो दुराचारी है
 
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भर्तृहरि नीति शतक-सत्यमार्गी कभी गुस्से में नहीं आते (gyani kabhi krodh nahin karte)

चाण्डालः किमयं द्विजातिरथवा शूद्रोऽथ किं तापसः किं वा तत्तविवेकपेशलमतियोंगीश्वरः कोऽपि किम्। इत्युत्पन्नविकल्पजल्पमुखरैराभाष्यमाणा जनैनं क्रुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यांन्ति स्वयं योगिनः।। हिन्दी में भावार्थ- महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि कोई चाण्डाल है
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सिंह का वार कभी खाली नहीं जाता (shatru par singh ki tarah var karen-kautilya ka arthshastra)

मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः। अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।। हिंदी में भावार्थ- बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जा
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चाणक्य नीति-आलस्य मनुष्य का शत्रु (alasya manushya ka shatru-chankya niti)

आलस्योपहता विद्या परहस्तगताः धनम्। अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।। हिंदी में भावार्थ- आलस्य विद्या का नष्ट करता है। दूसरे के अधिकार में गया धन वापस नहीं आता। कम बीज वाला खेत नष्ट हो जाता है। बिना नायक के सेना हार जाती है। अभ्यासाद्धार्यत विद
 
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मनु स्मृति-गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं (bhojan karne ka tarika-manu smruti)

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्। नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।। हिंदी में भावार्थ- मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये। न कुर्व
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संत कबीर वाणी-मनुष्यों में बुद्धि का अंतर होता है (manushy aur buddhi-sant kabir vani)

फेर पड़ा नहिं अंग में, नहिं इन्द्रियन के मांहि। फेर पड़ा कछु बूझ में, सो निरुवरि नांहि।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों के अंग एक तरह के हैं और सभी की इंद्रियों का काम भी एक जैसा है बस समझ का फेर है। इसलिये अपनी बुद्धि को शुद्ध रखने का
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चाणक्य नीति-अपने अच्छे बुरे काम के लिए आदमी ख़ुद ही जिम्मेदार (apne kam ke liye aadmi khud jimmedar-chankya niti

जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्। नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।। हिंदी में भावार्थ- मनुष्य अकेला ही जन्म लेकर मुत्यु को प्राप्त होता है। अपने हाथ से ही अकेले शुभ अशुभ कर्म करता है और अपने पाप पुण्य का फल अकेले ही भोगता और मोक्ष प्र
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संत कबीर वाणी-अंधे हाथी छूकर करते हैं अपना अपना बखान (andhon ka hathi-sant kabir vani)

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक। जो पै भीतर लखि पर, भीतर बाहिर एक। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंदर तो प्रवेश किया नहीं पर उस आत्ममय रूप के बाहर अनेक वर्णन किये जाते हैं। एक बार अगर हृदय में उस आत्मा रूप को समझ लें तो फिर अंदर बाहर एक जैसे हो
 
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चाणक्य नीति-पराया धन मिट्टी समझें (chankya niti)

यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।। हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोह
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संत कबीर वाणी-मांस का भक्षण मनुष्य के लिये नहीं (Kabir ke dohe)

यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय। मुख में आमिष मेलहिं, नरक पड़े सो जाये।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांस तो श्वान का भोजन है फिर मनुष्य की देह पाकर उसे क्यों खाये। यह जानते हुए भी जो मांस खायेगा वह नरक में जायेगा। मांस मछलियां खात है, स
 
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संत कबीर वाणी-गाली का जवाब न देने वाला संत (kabir ke dohe)

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक। कहैं कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब गाली आती है तो एक ही होती है पर उसका जवाब देने पर उसकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर कोई मूर्ख आदमी गाली बकता है तो बुद्धिमान का काम है कि वह चुप हो
 
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मनुस्मृति-अहिंसा से शीघ्र लक्ष्य प्राप्ति संभव

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्। न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।। हिंदी में भावार्थ- किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छ
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चाणक्य नीति-अच्छा काम कर आदमी मुहूर्त भर भी जिए तो ठीक

गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।। हिंदी में भावार्थ- भूतकाल में किये गये कार्य का शोक नहीं करते हुए भविष्य की चिंता करना चाहिये। विद्वान लोग वर्तमान के अनुसार अपने कार्य को योजनाबद्ध ढंग से करते हुए
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भर्तृहरि शतक-विद्वान की होती है दो प्रकार की गति

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां तत्वज्ञानामृताम्भः प्लवललितयां वातु कालः कदाचित्। नो चेन्मुग्धांनानां स्तनजघनघना भोगसम्भोगिनीनां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यतानाम्।। हिंदी में भावार्थ- इस परिवर्तनशील दुनियां में विद्वान
 
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संत कबीर वाणी-गुरू की अवज्ञा कर कोई तर नहीं सकता

कामी तरि, क्रोधी तरै, लोभी तरै अनन्त आन उपासी कृतधनी, तरै न गुरु कहन्त संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कामी और क्रोधी तर सकते हैं और लोभी भी इस भव सागर से तरकर परमात्मा को पा सकते हैं पर जो अपने इष्ट देव की उपासना त्यागता है और गुरु का संदेश नहीं
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