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ज़िन्दगी भर तुझे हम मनाते रहे.

ज़िन्दगी भर तुझे हम मनाते रहे. छ: महीने से कोई ग़ज़ल नहीं हुई थी... इसलिए इसको लिखने के बाद सीधे ही पोस्ट कर रहा हूँ, hat-trick पोस्ट type (3 दिन 3 पोस्ट). मुस्कुराते रहे, दिल लुभाते रहे, बात कुछ और थी, तुम छुपाते रहे. दर्द जैसे मुसलसल ग़ज़ल हो
 
दर्पण साह "दर्शन"
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एक नेनो सेकंड

तो अब, रिसता है... पर बहता नहीं. तो अब, रिश्ता है, पर कहता नहीं. तो अब, रहता है, पर चुभता नहीं. तो अब, है हर जगह, दिखता नहीं बस. इस तरह से, मुकम्मिल हुआ है, दर्द. कि आवाज़ भी नहीं, कोई साज़ भी नहीं. धडकनें भी नहीं, सासें भी नहीं. बस एक मुकम्मिल दर्द,
 
दर्पण साह "दर्शन"
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ज़िन्दगी

ज़िन्दगी  आज जिद न करो ज़िन्दगी, कुछ मेरी भी सुनो ज़िन्दगी. मैं अकेला शराबी नहीं, लड़खड़ाके चलो ज़िन्दगी. मुफलिसों का खुदा है अगर, मुफलिसी में रहो ज़िन्दगी. बात तेरी सुनूंगा नहीं, बात फिर भी कहो ज़िन्दगी. फिर कहाँ है तेरी वो तपिश? अब तो जिंदा दि
 
दर्पण साह "दर्शन"
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नि: वर्तमान

नि: वर्तमान   आज यूँ करें, फ़िर ज़िन्दगी हो जाएं. 'पेपर  बेक' नहीं रेड लाइट से लें '7 ओन्स्ट हेबिट्स' . कुछ कबूतर खरीद के उन्हें आज़ाद करें... 'किसी भी' उदास सूरत को देख मुस्कुरायें, खूब रोएं, और उससे ज़्यादा खिलखिलाएं. क्यूँ न उम्रदरा
 
दर्पण साह "दर्शन"
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शायद वो नज़्म थी .

एक उदास नज़्म , लिख के छोड़ दी, उस डायरी के पन्ने में.... किसी नन्हीं शैतानी ने, उसे करीने से फाड़कर, नाव बना दिया. अपने 'कागज़-पन' को भूल, नज़्म यूँ चिहुंकी, मानो, एक शोख़ सा गीत हो कोई. कभी पानी के ऊपर बलखाती, कभी गंदे नाले से दोस्ती करती... कभी खन
 
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जब अचानक

याद है, तुमने कुहनी से मारा था, मेरे पेट में? जब अचानक, पीछे से.... .... .... ....मेरे पेट में, अब भी दर्द है. त्रिवेणी हम मिले नहीं हैं कई दिन हुए, तुम्हें पहचान पाऊँगा मैं अबकी बार? मेरी बेरुखी से आइना उदास है. आज फिर गुम है चाँद का बताशा, दूधिया र
 
दर्पण साह "दर्शन"
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Deep Depression !!

मानव देह.... छिः ! आज और फिर कल .... और फिर मृत्यु !! और, इसी देह को, प्राप्त करने हेतु, चुना मैंने , 'दर्द' हमसफ़र !! दर्द को कब आएगी... नींद ? छल प्रपंच, MTV , प्रवचन... घर में बैठे... discovery में कभी ओरंगुटेन और कभी इम्होटाप. सभी कुछ तो इकठ्ठा क
 
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चेट रूम (लघु कथा)

दिन 1(रिषभ का कंप्यूटर): Me: Buzzzzz... Catchmeif: ह्म्म्म्म ... क्या चल रहा है ? Me: बहुत बड़ा तूफ़ान ... Catchmeif: मतलब ? Me: कॉलेज गयी थी ? Catchmeif: नहीं तबियत, Me: दवाई ली ? Catchmeif: ख़राब है. हाँ दो पन्ने पढ़ लिए थे तुम्हारी डायरी के , दिन
 
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चींटी और टिड्डा

चींटी और टिड्डा ' कहानी तो सबने सुनी होगी? भारत में भी हुआ था एक बार यही, जब चींटी ने पूरी गर्मी में मेहनत करके अपने लिए घर बनाया और टिड्डा?वो तो ठहरा मस्त मौला , तो इस कहानी में कैसे सुधर जाता? जाड़ों के दिनों में चींटी मज़े से अपने 3
 
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समीक्षा

एक अच्छा श्रोता ही अच्छा वक्ता होता है... कई दिनों से अच्छा पढ़ा नहीं... ...खासकर तबसे जब से ब्लॉग्गिंग शुरू की है... यकीन मानिए इसमें दोष मेरा भी नहीं... समयाभाव को भी दोष नहीं दूंगा... शायद आलस.... पर अबसे पढना शुरू... और लिखना बंद... या बहुत कम कम
 
दर्पण साह "दर्शन"
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कृति

दर्द'... ...मौन ! .... .... .... जैसे किसी, उलझी कविता में... ...दो शब्दों के बीच, अंतर ... ...कोई समझे उसे ! ________________________________________________________ 'शब्द' उजले उजले... ...एक के ऊपर एक गिरते हैं. पहाड़ बनाते हैं . __________________
 
दर्पण साह "दर्शन"
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रिश्ते

रिश्ता ....... एक अंतहीन झूठ ..... चिपक जाता है ,, पैदा होते ही ....या उससे भी पहले, और निरंतर चलता रहा है , उसके पैरों में छले...... .....पड़ जाते हैं,, ओंठ सूख जाते हैं , प्रेम क्षुधा से..... बेहाल !! पर, चलता रहता है , पहुँच कहीं नहीं पता , एक परिध
 
दर्पण साह "दर्शन"
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मखमली लिहाफ

याद न करना... एक 'कवायद' है.... "सफ़ेद हाथी को मत सोचो" वाली, इसलिए, मैंने..... .....तुझे याद न किया... रात भर, तेरी यादें.... खटखटाती रही थीं दरवाजा. पर.... जो सोया था 'मखमली लिहाफ' में, उस दिल ने... और, मैंने..... .....तुझे याद न किया... कान, नही स
 
दर्पण साह "दर्शन"
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किताब

ज़िन्दगी तुझे... पढ़ा है मैंने, कुछ बार... ...नज़दीक से ! इतनी कि... आँख में चुभने लगी तू . कुछ बार... ...दूर से ! इतनी कि... दूर उफ़क पर... तेरा हर शब्द, ..."अद्वेत" हो गया ! जो जिया हूँ... और जो जिऊँगा... दोनों! तू मुश्किल तो कभी न थी . आज भी नहीं.
 
दर्पण साह "दर्शन"
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दिल अगर फूल सा नही होता.

हुस्न गुलशन हुआ नहीं होता दिल अगर फूल सा नही होता. आदमी ने कहा नहीं होता तो खुदा भी खुदा नहीं होता जाते जाते बता गया वो मुझे दूर माने जुदा नहीं होता अक्स शायद बदल गया मेरा आइना बेवफा नहीं होता आँख से खूँ टपक गया 'ग़ालिब ' अब रगों में जमा नहीं होता
 
दर्पण साह "दर्शन"
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प्राची व उसके पार...

बहुत समय बाद एक ग़ज़ल (शायद ग़ज़ल नहीं) पोस्ट कर रहा हूँ . ग़ज़ल इसलिए नहीं की ये बे बहर है . ...पुरानी भी है. काफी दिनों बाद नेट सही हो पाया अब नियमित रहने की पूरी कोशिश करूंगा... अभी तक तो ऑफिस से ही थोडी बहुत.... ज़िन्दगी के होने से, कायनात नही हो
 
दर्पण साह "दर्शन"
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