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यदि सुधरा जो मैं

न ग़म होता है, न वहम होता हैतसव्वुर में मेरे जब मेरा सनम होता हैइंसां हैं सभी और सभी मेहरबानवो तो दीवारों का दूसरा नाम धरम होता हैयदि सुधरा जो मैं तो बच्चे हो जाएगे बाँझक्योंकि अच्छों का दुबारा नहीं जनम होता हैतक़दीर पे अपनी जो करते हैं भरोसाहाथों से उनके
 
Rahul Upadhyaya
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इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुएइक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैंहमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगारोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैंकहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिनऔर हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैंपीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती
 
Rahul Upadhyaya
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21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं लाईफ़-गार्ड चाहिएग्रेजुएट को नौकरी ही नहीं ग्रीन-कार्ड चाहिएखुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी सेहर किसी को अब मॉनेट्री रिवार्ड चाहिएजो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त काउन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये बॉडी-गार्ड' चाहिएघर बसाना इतना आसान नहीं इन
 
Rahul Upadhyaya
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कण-कण में भगवान है

आँखें इतनी कमज़ोर हैं किसपने दिखाई नहीं देते हैंआदमी तो आदमीगधे दिखाई नहीं देते हैंकण-कण में भगवान हैये कुत्ते कब समझेगेकि बिन बादल-बरसात केकुकुरमुत्ते दिखाई नहीं देते हैंकैसे हैं ये महानगरकैसा इनका विकास हैकि बढ़ रही है आबादीऔर बच्चे दिखाई नहीं देते
 
Rahul Upadhyaya
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