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चंद मुक्तक -संजीव 'सलिल'

चंद मुक्तकसंजीव 'सलिल'**कलम तलवार से ज्यादा, कहा सच वार करती है.जुबां नारी की लेकिन सबसे ज्यादा धार धरती है.महाभारत कराया द्रौपदी के व्यंग बाणों ने-नयन के तीर छेदें तो न दिल की हार खलती है..*कलम नीलाम होती रोज ही अखबार में देखो.खबर बेची-खरीदी जा रही
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
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गीत : भाग्य निज पल-पल सराहूँ..... ---संजीव 'सलिल'

        गीत :        भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....        संजीव 'सलिल'       
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मुक्तिका: मन का इकतारा.... --संजीव 'सलिल'

 : मुक्तिका :मन का इकतारासंजीव 'सलिल' **मन का इकतारा तुम ही तुम कहता है. जैसे नेह नर्मदा में जल बहता है.. *सब में रब या रब में सब को जब देखा. देश धर्म भाषा का अंतर ढहता है.. *जिसको कोई गैर न कोई अपना है.हँस सबको वह, उसको सब जग सहता है..*मेरा बैरी
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: ताल देते भँवर रे....... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत:संजीव 'सलिल'geetsalila.blogspot.कॉमसाजों की कश्ती सेसुर का संगीत बहालहर-लहर चप्पू लेताल देते भँवर रे....थापों की मछलियाँ,नर्तित हो झूमतींनादों-आलापों कोसुन मचलतीं-लूमतीं.दादुर टरटरा रहेकच्छप की रास देख-चक्रवाक चहक रहेस्तुति सुन सिहर रे....टन-टन-टन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: मिला न उनको पानी.... --संजीव 'सलिल'

गीत:मिला न उनको पानी....संजीव 'सलिल'**छलनेवाले, छले गए कह-सुन नित नयी कहानी.आग लगाते रहे, जले जब- मिला न उनको पानी....*नफरत के खत लिखे अनगिनत प्रेम संदेश न भेजा. कली-कुसुम को कुचला लेकिन काँटा-शूल सहेजा. याद दिलाई औरों को, अब याद आ रही नानी....*हरियाली
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत: काला कूट धुआँ....... --संजीव 'सलिल'

गीत: संजीव 'सलिल'**तन-मन, जग-जीवन झुलसाता काला कूट धुआँ.सच का शंकर हँस पी जाता, सारा झूट धुआँ....आशा तरसी, आँखें बरसीं,श्वासा करती जंग.गायन कर गीतों का, पातीहर पल नवल उमंग.रागी अंतस ओढ़े चोला भगवा-जूट धुआँ.....पंडित हुए प्रवीण, ढाईआखर से
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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अंतिम गीत: लिए हाथ में हाथ चलेंगे.... ---संजीव 'सलिल'

अंतिम गीतलिए हाथ में हाथ चलेंगे.... संजीव 'सलिल'(टीप: यह गीत पूज्य मातुश्री स्व. शांति देवी के निधन पश्चात् पिताश्री  अब स्व. राज बहादुर वर्मा की मनःस्थिति का शब्दचित्र है जिन्हें अपनी सर्वंगिनी के बिना जीवन स्वीकार्य न हुआ. वे सदा दिवंगता पत्नी की
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: मुँह में नहीं जुबान...... --संजीव 'सलिल'

नव गीत:संजीव वर्मा 'सलिल'  मौन देखकरयह मत समझोमुँह में नहीं जुबान...*शांति-शिष्टता,धैर्य-भद्रता,जीवट की पहचान.शांत सतह के नीचे हलचल,मचल रहे अरमान.श्वेत-शयन लख यह मत समझो रंगों से अनजान. मौन देखकर यह मत समझोमुँह में नहीं जुबान...*ऊपर-नीचे सब जानें पर
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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अंतिम गीत: लिए हाथ में हाथ चलेंगे.... ---संजीव 'सलिल'

 . अंतिम गीतसंजीव 'सलिल' *ओ मेरी सर्वान्गिनी! मुझको याद वचन वह 'साथ रहेंगे'तुम जातीं क्यों आज अकेली?, लिए हाथ में हाथ चलेंगे....*दो अपूर्ण मिल पूर्ण हुए हम सुमन-सुरभि, दीपक-बाती बन. अपने अंतर्मन को खोकर क्यों रह जाऊँ मैं केवल तन? शिवा रहित शिव, शव
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीत : जब - तब --संजीव 'सलिल'

गीत : जब - तब संजीव 'सलिल' अभिषेक किया जब अक्षर का, तब कविता का दीदार मिला.शब्दों की आराधना करी-तब भावों का स्वीकार मिला.जब छंद बसाया निज उर में तब कविता के दर्शन पाये.पर पीड़ा जब अपनी समझीतब जीवन के स्वर मुस्काये.जब वहम अहम् का दूर हुआतब अनुरागी मन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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नवगीत: आँखें रहते सूर हो गए --संजीव 'सलिल'

नवगीत;संजीव 'सलिल'*आँखें रहते सूर हो गए,जब हम खुद से दूर हो गए.खुद से खुद की भेंट हुई तो-जग-जीवन के नूर हो गए...*सबलों के आगे झुकते सब.रब के आगे झुकता है नब.वहम अहम् का मिटा सकें तो-मोह न पाते दुनिया के ढब.जब यह सत्य समझ में आया-भ्रम-मरीचिका दूर हो
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मुक्तक / चौपदे: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

मुक्तक / चौपदेआचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इनसलिल.संजीव@जीमेल.comसाहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है. काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर. रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद
 
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नवगीत: चले श्वास-चौसर पर... ---संजीव 'सलिल'

*चले श्वास-चौसर पर...आसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल,कागा हँसकर बोले काँव...*संबंधों को अनुबंधों नेबना दिया बाज़ार.प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलम.बद को अच्छा माने दुनिया कहे बुरा बदनाम.ठंडक देती धूपतप
 
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गीत: निर्झर सम / निर्बंध बहो संजीव 'सलिल'

गीत संजीव 'सलिल' निर्झर सम निर्बंध बहो,सत नारायण कथा कहो...जब से उजडे हैं पनघट.तब से गाँव हुए मरघट.चौपालों में हँसो-अहो...पायल-चूड़ी बजने दो.नाथ-बिंदी भी सजने दो. पीर छिपा-सुख बाँट गहो...अमराई सुनसान न हो.कुँए-खेतवीरान न हो.धूप-छाँव मिल 'सलिल'
 
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पिताजी

स्मृति गीत / शोक गीतयाद आ रही पिता तुम्हारीसंजीव 'सलिल' *याद आ रहीपिता तुम्हारी...*तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ?जीवन का सब विष पी पाऊँ.अमृत बाँट सकूँस्वजनों को-विपदा को हँससह मुस्काऊँ.विधि ने काहेबात बिगारी?याद आ रहीपिता तुम्हारी...*रही शीश पर जब तव छाया.तनिक
 
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नवगीत / भजन: भोर हो गयी... --संजीव 'सलिल'

नवगीत / भजन:संजीव 'सलिल' जाग जुलाहे!भोर हो गयी...***आशा-पंछी चहक रहा है.सुमन सुरभि ले महक रहा है..समय बीतते समय न लगता.कदम रोक, क्यों बहक रहा है?संयम पहरेदार सो रहा-सुविधा चतुरा चोर हो गयी.जाग जुलाहे!भोर हो गयी...***साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.आसों का धागा
 
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संजीव सलिल की रचनाएँ

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: सारा का सारा हिंदी हैआचार्य संजीव 'सलिल'* जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है. हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है.... मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है. लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का
 
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नवगीत: चले श्वास-चौसर पर -संजीव 'सलिल'

नवगीतसंजीव 'सलिल'चले श्वास-चौसर परआसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल कागा हँसकर बोले काँव...*सम्बंधों को अनुबंधों ने बना दिया बाज़ार. प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलाम.बाद को अच्छा माने दुनिया,कहे बुरा
 
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नर्मदा नामावली नर्मदा नामावली

नर्मदा नामावली नर्मदा नामावलीपुण्यतोया सदानीरा नर्मदा.शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा.शैलपुत्री सोमतनया निर्मला.अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा.आदिकन्या चिरकुमारी पावनी.जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा.विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी.कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा. शाशिसुता
 
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नवगीत: गीत का बनकर / विषय जाड़ा --संजीव 'सलिल'

नवगीत:संजीव 'सलिल' गीत का बनकर विषय जाड़ानियति पर अभिमान करता है...कोहरे से गले मिलते भाव.निर्मला हैं बिम्ब के नव ताव..शिल्प पर शैदा हुई रजनी-रवि विमल सम्मान करता है...गीत का बनकर विषय जाड़ानियति पर अभिमान करता है...फूल-पत्तों पर जमी है ओस.घास पाले को
 
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नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'

नवगीत: हवा में ठंडक संजीव 'सलिल'हवा में ठंडक बहुत हैकाँपता है गात साराठिठुरता सूरज बिचाराओस-पालानाचते हैं-हौसलों को आँकते हैंयुवा में खुंदक बहुत हैगर्मजोशी चुक न पाए,पग उठा जो रुक न पाएशेष चिंगारीअभी भी-ज्वलित अग्यारी अभी भीदुआ दुःख-भंजक बहुत हैहवा
 
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गीत: हे समय के देवता --हे समय के देवता!

गीतहे समय के देवता! संजीव 'सलिल' *हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...*श्वास जब तक जल रही है,आस जब तक पल रही है,अमावस का चीरकर तम-प्राण-बाती जल रही है.तब तलक रवि-शशि सदृश हम रौशनी दें तनिक जग को.ठोकरों से पग न हारें-करें ज्योतित नित्य मग को.दे सको
 
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शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल"

शुभ कामनाएं सभी को...संजीव "सलिल"salil.sanjiv@gmail.comdivyanarmada.blogspot.com*शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन्दन
 
दिव्य नर्मदा
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"खज़ाना"

गीत संजीव 'सलिल' निर्झर सम निर्बंध बहो, सत नारायण कथा कहो... जब से उजडे हैं पनघट. तब से गाँव हुए मरघट. चौपालों में हँसो-अहो... पायल-चूड़ी बजने दो. नाथ-बिंदी भी सजने दो. पीर छिपा- सुख बाँट गहो... अमराई सुनसान न हो.
 
दिव्य नर्मदा divya narmada