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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

राह कौन सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरुं या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में घाटों के व्यापार में कौड़ी कौड़ी का
 
स्वार्थ
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उलझन

अपने ही बुने जालों में फंसा मन जाने कब शांति को कहाँ दूर छोड़ आया ? कुछ और पाने की चाह में , मिले को भी गंवाता जाता , पर ये कुछ और परिभाषित क्यों नहीं हो पाता ? कहाँ जाकर रुकेगी अनजान राहों पर चलने की मन की फिसलन ?
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