jawani
जवानी जब भी चढती है ,बग़ावत खूब करती है।मुहब्बत की शिलाओं पर ,वफ़ा की परतें जमती हैं।रगों मे दर्द बढ्ता है , निगाहें पानी भरती हैं ।झुलायें, नेकी को कब तक,बदी भी तो मचलती है।समंदर की शराफ़त बस, किनारों तक उमडती है।हसीनों की ज़मानत मे,हवस की लौ भडकती
May 26 2010 10:39 AM



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