ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक.. उस्ताद बरकत अली खान की आवाज़ में इश्क की इन्तहा बताई ग़ालिब ने
महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७४इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है
Mar 10 2010 08:23 AM



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