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स्वप्न

छविगृह से शारीरिक व मानसिक रूप से थका हरा मैं लौटा तो निराशा के कोहरे में आस्था का सूर्य डूब चूका था | प्रेरणा से परिपूर्ण असंख्य दृश्य जिन आँखों से देखे थे उन्ही से अंतिम दो तीन व्यंग्यात्मक दृश्य देखकर मेरे चिंतन में किंकर्तव्यविमूढ़ता का अँधेरा गहरा
 
क्षत्रिय
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नजौगे -२ ?

भाग एक से आगे ........तू तू मैं मैं इतनी बढ़ गयी थी कि आसपास के दो चार पडौसीयों के ८-१० बच्चे समीप आने का दुस्साहस न करते हुए दूर से ही संजय की भांति इस महाभारत का आँखों देखा आनंद उठा रहे थे | चपरासी कह रहा था , आधा हिस्सा उस अकेले का है और तांगे वाला व
 
क्षत्रिय
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नाजोगे ?

दृश्यपटल पर मुझे अपना गांव दिखाई दे रहा था | मैं सिहर उठा , अब जाने क्या देखने को मिलेगा ? इतने में गांव बड़ा होता गया ; दृश्यपट की सीमाओं से उसकी सीमाएं बाहर निकलने लगी | एक छोटा सा घर बड़ा होता जा रहा था और कुछ ही क्षणों में वही घर सारे दृश्यपटल पर छा
 
क्षत्रिय
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