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बरसाती ख़याल कुछ यू भी

मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली | ================================ ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली | =================
 
mehhekk
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उमस भरी दोपहरी में

उमस भरी दोपहरी में गर्मी की चादर ओढ़े धूप टहल रही थी वो बादल का टुकड़ा आया झाक के देखा उसने, आँखों के सूखे मोती दौड़ा भागा , कुछ आवाज़ लगाई लू से भारी हवा ठंडक बन लहराई छाव का शामियाना धरा पर सज़ा हज़ारों बादलों का जमघट जो लगा टापुर टापुर बूंदे बड़ी
 
mehhekk
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इन फूलों की बारिश में

इन फूलों की बारिश में भीग लेते है हम भी मोहोब्बत के इत्र की महक जरा बदन पर चढा लूँ अगले मौसम तक फिर ये ताजगी रहेगी मन में . ——————————————————
 
mehhekk