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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

राह कौन सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरुं या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में घाटों के व्यापार में कौड़ी कौड़ी का
 
स्वार्थ
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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की व्यथा

सूर्य गिर गया अन्धकार में ठोकर खाकर भीख माँगता है कुबेर झोली फैलाकर कण कण को मोहताज कर्ण का देश हो गया माँ का अँचल द्रुपद सुता का केश हो गया
 
स्वार्थ