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पतंजलि योग दर्शन-स्थिर होकर सुख से बैठने का नाम आसन है (patanjali yog sahitya in hindi)

स्थिरसुखमासनम्।हिन्दी में भावार्थ.स्थिर होकर सुख से बैठने का नाम आसन है।प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापतिभ्याम्।हिन्दी में भावार्थ-आसन के समय प्रयत्न रहित होने के साथ परमात्मा का स्मरण करने से ही वह सिद्ध होता है।ततोद्वन्द्वानभिघातः।।हिन्दी में भावार्थ-आसनों से
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हिन्दू धर्म संदेश-धर्म रहित कार्य केवल मूर्ख आदमी ही करता है (moorkh aadmi karta hai dharma rahit karya-hindu dharma sandesh)

आधिव्याधिविपरीतयं अद्य श्वो वा विनाशिने।कोहि नाम शरीराय धम्मपितं समाचरेत्।।हिन्दी में भावार्थ-तमाम तरह के दुःखों से भरे और कल नाश होने वाले इस शरीर के लिये धर्म रहित कार्य केवल कोई मूर्ख आदमी ही कर सकता है।महावाताहृतभ्त्रान्ति मेघमालातिपेलवैः।कष्टां नाम
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कौटिल्य दर्शन-डरपोक की संगत करना भी ठीक नहीं

प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि।सुखाभियोज्यो भवति विषयेऽप्यतिसक्तिमान्।।हिन्दी में भावार्थ-विरक्त प्रकृति वाले राजा को उसके लोग युद्ध में ही छोड़कर चले जाते हैं और विषयों में आसक्त पुरुष को थोड़ा सुख देकर ही जीत लिया जाता
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मनुस्मृति-श्रेष्ठ लोगों के साथ ही संबंध बनाने चाहिए (shreshth purush se sambandh-manu smruti)

उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।हिन्दी में भावार्थ-अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के
 
दीपक भारतदीप
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मनु दर्शन-आत्म नियंत्रित कार्य ही करें (atmanilantri kam karen-manu darshan in hindi)

सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।हिन्दी में भावार्थ-जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है। यत्कर्मकुर्वतोऽस्य
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भर्तृहरि नीति शतक-स्वर्ग की कल्पना अल्पज्ञान की देन (hindu dharma sandesh-swarg ki kalpana)

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना
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श्रीगुरु ग्रंथ साहिब-प्रभु का नाम कभी पुराना नहीं पड़ता (shriguru granth sahib

‘निरभउ निरंकार सच नाम।जा का कीआ सगल जहान।।हिन्दी में भावार्थ-निर्भय निरंकार का नाम ही सच है। उसी परमात्मा का यह पूरा संसार है।‘सचु पुराणा होवे नाही।’हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में समय के साथ सब वस्तु पुरानी हो जाती है लेकिन प्रभु का नाम कभी भी पुराना
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर के दोहे-नशे का सेवन करने वाले इस संसार का दरिया पर नहीं कर सकते

अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए। छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।आपन दोजख जात है, और
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रहीम दर्शन-सज्जन लोग समाज सेवा के लिए संपत्ति संचय करते हैं

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान।।कविवर रहीम कहते हैं कि जिसत तर पेड़ कभी स्वयं अपने फल नहीं खाते और तालाब कभी अपना पानी नहीं पीते उसी तरह सज्जनलोग दूसरे के हित के लिये संपत्ति का संचय करते हैं। तन रहीम है कर्म
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