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शर्म हमको मगर नही आती....

शर्म हमको मगर नही आती....फटाफट इसमें* मिल जती है शोहरत,      [*T-20] जो हारे भी तो खुल जाती है किस्मत.हाँ ! मैंने दी है थाने  पर भी रिश्वत,न देता, कैसे बनता 'पास पोरट' ?हो रिश्वतखोर या
 
Mansoor Ali
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आखिर में

शब्दो से माला-माल कर रहे  अजित जी, की आज [१८-०२-१०] की ''शब्दों का सफ़र'' पर  प्रेरणा दायक पोस्ट से प्रभावित:-  माल बनता है मल ही आखिर में,'आज' बनता है 'कल'* ही आखिर में.धन पशु है; पशु भी धन ही है,चल भी होता अचल ही आखिर मे. महंगी होती
 
Mansoor Ali
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लेखा-जोखा

 लेखा-जोखा फिर नए साल ने दस्तक दी है,सर्द झोंको ने भी कसकर दी है.अपनी तकदीर हमें लिखना है,कोरे सफ्हात की पुस्तक दी है.बा मुरादों ने दुआए दी तो,ना मुरादों ने छक कर पी है.'तेल-आंगन' से न निकला फिर भी, हाद्सातों ने तो  करवट ली है.बर्फ की तरह
 
Mansoor Ali
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