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हिटलर और खेल : अशोक सेक्सरिया

पिछले भाग से आगे : १९ नवम्बर से एशियाई खेलों के नाम पर जो अश्लीलता होने जा रही है , उसमें कहीं भी वह खेल नहीं होगा जिसकी हमने ऊपर चर्चा की । इनमें तमगे बटेंगे , राष्ट्रगानों की धुनें बजेंगी और हारने का मातम व जीतने की बेहयाई होगी। ऐसे में एशियाई खेलों को
 
अफ़लातून
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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

एशियाई खेलों को लेकर देश भर में जब भयंकर उन्माद फैलाया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठाना कि यह खेल वास्तव में खेल हैं भी कि नहीं – मूर्खता लगता है । मूर्खता के डर से आदमी सोचना बंद कर देता है और उस पागलपन में शामिल हो जाता है जो सरकार , कम्पनियां [...]
 
अफ़लातून