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ग़ज़ल: महका करेंगी ग़ज़लें

मेरी दर्द वाली रातों की नज़र उतार देनाये गर रहीं सलामत तो महका करेंगी ग़ज़लेंफ़स्ले बहार आलम और आंसुओं का बहनाखुश मौसमों में देखना छलका करेंगी ग़ज़लेंअपने अकेलेपन में भी कभी मुतमइन रहना कोई न कुछ कहेगा पर बातें करेंगीं ग़ज़लेंदिल से जुड़े रिश्तों के लिए न दुआ
 
अशोक जमनानी
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ग़ज़ल: दरख़्त

Shareसूखे पत्तों को जब आकर हवा उड़ाती हैशाख के पत्तों की भी रूह कांप जाती हैदरख़्त अपने ही पत्तों का हो नहीं पाताचिड़िया पागल है वहां घोंसला बनाती हैधूप पेड़ों के सिर जमाती जब डेरा आकर ये छांव पेड़ों तले तब बस्तियां बसाती हैदरख़्त जो भी खास थे वो बन गये खुदाआम
 
अशोक जमनानी
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तीतर

Share       कुछ दिनों पहले मंत्री जी के काफिले से दो-चार होना पड़ा। आम आदमी होने के नाते मैं चुपचाप सड़क के किनारे खड़ा हो गया ताकि ‘साहब’ लोगों की गाड़ियां आराम से निकल जायें। मंत्री जी की कार के आगे पुलिस की गाड़ी थी और पीछे
 
अशोक जमनानी
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लघु कथा: लघु कथा

Share        आजकल पथिक जी की लघु-कथाओं की तूती बोल रही है। साहित्यिक बिरादरी की प्रशंसा और ईर्ष्या मिश्रित आलोचना भी मुखर है। पथिक जी की लेखनी और ज़बान दोनों ही धारदार हैं। कोई उनसे पूछता है कि कहानी या उपन्यास के
 
अशोक जमनानी
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गीत:ओ पथिक तू चल अकेला

Shareओ पथिक तू चल अकेला कारवां बन जायेगातू समर पर हो समर्पित; तो अमर हो जायेगाना आंसुओं का अर्ध्य  हो न पीर की परवाह होयश की कोई कामना न पथ में शीतल छांव होतू नींव के पत्थर को अपनी आस्था का दान देनिर्माण का हर कंगूरा तुझसे ही जीवन पायेगायह
 
अशोक जमनानी
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लघु कथा: पेटदर्द

Share                 मंत्री जी के पेट में रह-रह कर दर्द उठता। दिन पर दिन बीतते जा रहे थे लेकिन दवा और दुआ दोनों ही बेअसर सिद्ध हो रहीं थीं।अच्छे से अच्छा इलाज़ चल रहा था;
 
माणिक
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गजल- बादल

Shareबादल हैं आसमान में पानी लिए हुए मिटेंगे पहले इनकी उड़ान तो देखो टूटते तारों का गिरना है सच मगरटूटने वालों की रोशन शान तो देखो दो रोटियों के बदले आसीसता जहांकंगाल से फकीर का ईमान तो देखो लुटकर निभाता है साथ कहकहों कालुटे हुए का कीमती सामान तो देखो महल
 
माणिक
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लघु कथा: राजमार्ग

Share            पुरानी सड़क जिसे बस इसलिए सड़क कहा जाता था क्योंकि सरकारी रिकार्ड में वो सड़क के रूप में दर्ज थी। गढ्ढे इतने अधिक थे कि लोग बीस किलोमीटर के फेर वाला लम्बा रास्ता अपनाते थे पर उस सड़क से
 
माणिक
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(गीत)कभी सुना है गीत

Shareकभी सुना है गीत श्रमिक का जो वो रातों में गाता हैसूरज संग जल-जल जो पाया गाकर उसे भुलाता है कभी सुना है गीत पथिक का राह में जो दोहराता हैमंज़िल देती आवाज़ें ; अक्सर छूट गया भी बुलाता हैकभी सुना है गीत विरह का जो आंसू बन जाता हैशब्द न कोई सुर संगी पर सब
 
माणिक
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पुष्प की अभिलाषा --तथ्यों की जानकारी

Shareचाह नहीं मैं ; सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊंचाह नहीं प्रेमी की माला बिंध प्यारी को ललचाऊंचाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊंचाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूं भाग्य पर इठलाऊंमुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ में देना तुम फेंक !मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने
 
माणिक
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पचमढ़ी में शरद जोशी-हरिशंकर परसाई प्रसंग

Shareअशोक जमानानी को सम्मानित करते हुए श्री त्रिभुवन नाथ शुक्ला                        सतपुड़ा पर्वत श्रंखला पर  प्रकृति की अद्भुत छटा
 
माणिक
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अशोक जमनानी की हाल लिखी रचनाएँ

कहानी - बेचारा रामलालShare             छोटे से शहर का छोटा सा मोहल्ला ऐसी ज़गहों पर तो ख़बर आग की तरह फैलती है; बस फैल गयी। सिपाही रामलाल की लड़की किसी दूसरी जात के लड़के के साथ भाग गई। जिसने सुना
 
माणिक
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कहानी - बेचारा रामलाल

Share             छोटे से शहर का छोटा सा मोहल्ला ऐसी ज़गहों पर तो ख़बर आग की तरह फैलती है; बस फैल गयी। सिपाही रामलाल की लड़की किसी दूसरी जात के लड़के के साथ भाग गई। जिसने सुना वो सब काम छोड़कर दूसरे
 
माणिक
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ग़ज़ल- परिंदों लौट आना

Share परिंदों शाम को लौट आना घर ज़रा ज़ल्दी हम दीवारें इस ख़ामोशी से ऊब जातीं हैंउतने ही दानें चुनो जितनी ज़रूरत है हमें यहां कितनी चोंचें घोंसलों  में रीती आतीं हैंजुगनुओं से कह दो ना रात में चमका करें वो रोशनी महलों की इससे खीज जाती हैउनसे ना मिलना
 
माणिक
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(ग़ज़ल)साथ-साथ

Shareवो मेरे ही साथ-साथ चलता रहाआंखों में झूठा ख़्वाब पलता रहाकुछ तो मिट्टी ही अपनी गीली है बारिश में घर से मैं निकलता रहातेरा ख़्याल बहुत रेशमी मेरे हमदमउसे लेकर मैं पत्थरों पे चलता रहाकौड़ियां जोड़ने के वास्ते रहा जीता खर्च सांसों का संग संग चलता रहारेत पर
 
माणिक
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लघु कथा -'' कुछ देर ''

Share                                         धूप ऐसी
 
माणिक
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(ग़ज़ल)-बंधन

शेयरतू बांधने चला मुझे मैं बंध न पाऊंगा है प्रीत की ये रीत मैं कैसे निभाऊंगाबादलों से जो गिरी वो पहली बूँद मैं गिरके खो जाऊं कहां कैसे बताऊंगासूर्य की पहली किरण भोर का परिचयजग को रोशनी  की सौगात दे जाऊंगाजो उठी तेरे हृदय वो पहली पीर मैंतुम भूलना
 
माणिक
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(ग़ज़ल) - बाग़ी

शेयरशहर का आलम बाग़ी हो तब तो घर से बाहर निकलेंअभी तो सड़कों पर मुर्दे जाकर किससे क्या बात करेंकुछ आग जले या धूप खिले या चिंगारी ही मिल जाएअभी तो फैली धुंध ही धुंध बैठे हम हाथ पर हाथ धरेहर रोज सताए जाते जो उनकी सिसकी ही सुनाई देअभी तो सिले हुए हैं लब कुछ
 
माणिक
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होशंगाबाद में एक साहित्यिक आयोजन

साहित्य अकादेमी,मध्यप्रदेश द्वारा पिछले16-17 अप्रेल को होशंगाबाद में एक साहित्यिक आयोजन किया गया था. ये कार्यक्रम पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की याद हुवा राष्ट्रीय सत्र की संघोष्टी का था.कार्यक्रम का शुभारम्भ साहित्य अकादेमी के नव-नियुक्त निदेशक डॉक्टर
 
माणिक
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