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कितना कुछ छिपाती रहती हैं लड़कियाँ आत्महत्या के एक दिन पहले तक

विजयशंकर चतुर्वेदी यथार्थ के कवि हैं। वे समय के आर और पार देखने वाली कविताएँ लिखते हैं। 'पृथ्वी के लिए तो रुको' कविता-संग्रह की बहुत सी कविताओं में विजय वास्तविकता के शब्दनाव खेते हैं। देखिए कुछ और नज़ीर-बड़े बली रहे वेवे जब तक रहेवायु, पृथ्वी, जल,
 
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चीयर लीडर्स के हिन्दुस्तान में विदर्भकन्या सूर्यकान्ता

कृष्णकांत की काव्यप्रतिभा से हमारे पाठक परिचित हैं। फरवरी 2010 के यूनिकवि कृष्णकांत अपनी कविताओं में समाज के गरीब, किसान, स्त्री, दलित और बहुत से उपेक्षितों का दुःख-दर्द समेटते हैं। ऐसी ही एक कविता, आपकी नज़र----विदर्भकन्‍या की मौत पर सूर्यकान्‍ता
 
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बाढ़ एक ख़बर है, और ख़बर के बाहर कुछ नहीं

बहुत लम्बे समय से हमने अपनी ओर से पाठकों को कुछ नहीं पढ़ाया। इसलिए हमने सोचा कि इसकी दुबारा शुरूआत बहुत असरकारी कविताओं से होनी चाहिए। बहुत पहले युवा कवि अच्युतानंद मिश्र की एक कविता 'ढेपा' हमने प्रकाशित की थी, जिसे पाठकों ने काफी सराहा। इस बार हम
 
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