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कायर नक्सली नहीं, भारत सरकार है!

नक्सलियों ने सरकार के कान पर एक और धमाका कर दिया है. ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से गिरा कर एक और नरसंहार. अब तक मरने वालों कि संख्या ९८ बताई जा रही है लेकिन ये १५० के आस-पास जा कर ही रुकेगी. ३०० से ज्यादा लोग घायल हैं. मरने वालों में
 
Sachin Rathore
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ये कार्रवाई है या पुरस्कार

कल रात एनडीटीवी पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश हुई-  "दंतेवाडा में नक्सली हमले के बाद पहली कार्रवाई" स्क्रीन पर ये लाइन पढ़ के मैं मानो कूद ही पड़ा. लगा कि आज हमारी फोर्स ने कोई बड़ा काम कर दिया. लगा सरकार ने कोई बड़ा कदम उठा लिया.
 
Sachin Rathore
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सभी आतंकवादी सरकार के दामाद हैं!

भारत सरकार के खाते में एक और दामाद चढ़ गया है. अजमल कसब को फांसी की सजा हो जाने के बाद सरकार को एक और दामाद की खातिर करने का मौका मिल गया है. कुछ लोगों ने फांसी की सजा सुनाये जाने पर बड़ा उत्सव मनाया साहब. बेचारे कितने नादान हैं, अपने देश का
 
Sachin Rathore
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भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 : भारत में विधि का इतिहास-77

ब्रिटिश संसद ने 1861 में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम पारित किया और इसी के साथ भारत में उच्च न्यायालयों के इतिहास का आरंभ हुआ। इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश क्राउन को भारत में आवश्यकतानुसार उच्च न्यायालय स्थापित करने का प्राधिकार दिया गया था। प्रारंभ में
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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उच्च न्यायालयों की स्थापना के लिए अधिनियम : भारत में विधि का इतिहास-76

ब्रिटिश भारत में 1861 तक जो न्यायिक व्यवस्था विकसित हुई थी वे दो भिन्न प्रकार की थीं। प्रेसीडेंसी नगरों मद्रास, कलकत्ता और मुम्बई में सुप्रीम कोर्ट स्थापित थे जो ब्रिटिश क्राउन के न्यायालय थे। ये ब्रिटिश संसद की विधिक प्राधिकारिता और सुप्रीम कोर्ट द्वारा
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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पंजाब की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-74

पंजाब को 1849 में ब्रिटिश भारत में सम्मिलित कर लिया गया। वहाँ जो न्यायिक व्यवस्था स्थापित की गई वह एक ही प्राधिकारी के अधीन सौंपी गई, जिसे न्यायिक आयुक्त (Judicial Commissioner) कहा जाता था। यह व्यवस्था जटिल होने के कारण सफल और उपयोगी सिद्ध नहीं हुई।
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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प्रथम विधि आयोग की सिफारिशें और अविनियमित प्रान्तों की न्यायिक व्यवस्था

मद्रास, बम्बई और कलकत्ता प्रेसीडेंसियों में विधि व्यवस्था का विकास अलग अलग हुआ था और उन में पर्याप्त भिन्नता थी। इन दिनों जो न्यायिक व्यवस्था भारत के कंपनी शासित क्षेत्रों में स्थापित थी वह संतोष जनक नहीं थी। इस कारण से 1843 में प्रथम विधि आयोग का गठन
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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बम्बई में 1827 के बाद की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-71

दीवानी न्याय व्यवस्था बम्बई प्रेसीडेंसी में जल्द ही यह महसूस होने लगा कि 1827 के न्यायिक सुधारों में और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। 1828 में ही सदर दीवानी अदालत का मुख्यालय सूरत से मुम्बई स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन साथ ही गुजरात में एक अपील
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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बम्बई में न्यायिक व्यवस्था का विकास : भारत में विधि का इतिहास-70

बम्बई में क्षेत्रीय प्रभुता का विस्तार शनैः शनैः हुआ। इस कारण से वहाँ न्यायिक समस्याएँ भी कम रहीं और न्यायिक व्यवस्था का विकास भी सीमित हुआ। 1793 में बंगाल में लागू की गई लॉर्ड कॉर्नवलिस की न्यायिक व्यवस्था को ही आधार बना कर 1799 में बम्बई में कंपनी
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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शक्ति

महिला सशक्तिकरण की आज कल खूब बातें होती हैं। गरमा गर्मी गोटी होती रहती भी गरमा गर्मी होती रहती है। कुछ लोग उनकी कार्य क्षमता पर भी प्रश्न चिह्न लगाते हैं। ऐसे लोगों के लिए मेरठ एकd बढ़िया उदहारण है। मेरठ के हालिया दंगों में ऐसी तस्वीर सामने आई की रहा
 
APNA SAMAJ
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शर्म करो नेताओं

आतंकवाद और भारत का चोली दामन का साथ है। इसका दंश झेलते झेलते देशवासियों को अब आदत पड़ गई है मरने की और रोने की। लेकिन मुंबई की घटना ताबूत में आखिरी कील साबित हुई। लोगों का गुस्सा चर्म पर है। देश भर में नेताओं को गालियां पड़ रहीं हैं। होम मिनिस्टर की बल
 
APNA SAMAJ
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