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फलक

न जाने कब ये शाम का गोला ढल जाए. और एक स्याह रात की चादर सिल जाए.करोड़ों जगमगाते टुकड़े पैबंद हों उस पर, स्याह शामियाने पे नक्काशी खिल जाए.तू रोज़ देखता है टक-टकी लगाए मुझे.बढाऊँ हाथ जो ऊपर, तू छिटक जाए मुझे किसी रोज़ पैबंद हो जाऊं शामियाने पर,ए खुदा तू
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तन्हाई

ए कलम काश मेरा भी कोई तेरे कागज़ की तरह हमदम होता,मेरे दिल से उमड़ती स्याही कोमैं किसी से तो बाँट पता.ए आंसू काश मेरा भी कोई तेरेगाल की तरह हमराज़ होता,मेरे बिखरते मोतिओं को यहाँ कोई तो समझ पता.ए धरती काश मेरा भी कोई तेरेआसमां की तरह हमजाद होता,मेरी आग
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मौन

मौन है क्यों मौन हैयहाँ सभा भरी क्यों मौन है,क्या हुआ है यहाँ बताओ,इस नीरस गढ़ का राज़ बताओ.धुआं हुआ है बिन आग यहाँ क्या?यहाँ सभा भरी क्यों मौन है?रात बढ़ी है आहिस्ता सेयहाँ अन्ध्यारा क्यों चोर है,क्या हुआ है यहाँ बताओ,इस खामोशी का राज़ बताओ.भूख पड़ी है
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हम

कुछ ख्वाब तुमने बुने थे, कुछ मैंने, कुछ हमनेऔर कुछ अध्बुने ही रह गये थे वक़्त की मेज़ पे.तुम वो खवाब मुझ से और मैं तुमसे मांगता रहा,आज जब कई साल बाद मैंने महसूस किया कि वोन तुम्हारे पास थे और न मेरे, वो ख्वाब आज भी वक़्त की मेज़ पर महफूज़ उसी करवट सोये हुए
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"जन्मदिवस"

हल्दी की पोटली फिर से हाथ देते होमृत्यु की राह पर जीवन को साध देते हो.सिर्फ एक तारीख बढ़ने भर से ,जीवन की सीमायें माप लेते हो.जीवन की ढलती सांझ परपल भर मैं कैसा समां बाँध लेते हो.साँसों  की घटती उम्र को ,क्यूँ "जन्मदिवस" का नाम देते हो
 
narendra pant
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उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है, आशा की पोटली  में उनको  संजो पाता हूँ ,उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपतामन के
 
narendra pant
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कारगिल शहीदों के लिए

रण में शहीद , वहां से सकुशल वापिस लौटे तथा आज भी हमारी रक्षा करते सभी सैनिकों को समर्पित - मर मिटे हजारों लाल यहाँ पर श्वेत बरफ तब लाल हुई. वादी वादी गूंझी घन घन शत्रु पे बौछार हुई. चढ़े चोटी पर वीर हमारे विजय तिरंगा फेहराया. लहू के हर कतरे से अपने दि
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काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता, मैं रो़ज़ उससे तोड़ता तू रोज़ उसे सीती. यूँही सिलसिला सालों चलता, ये अमावस यूँही इतनी लम्बी न हुई होती.... मखमली पंखुडी गुलाब की गर पलकों पे न सजी होती तेरे, नज़रें हमसे भी किसी रोज़ टकराई होतीं यूँ काटों में न फंसी
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क्यों भूल जाते हैं माँ को कुछ लोग??

कई रातें बीतीं हैं यूँही पलकें झपकते-झपकते, माँ मुझे अपनी गोद में फिर जी भर के सो जाने दे. नींद से अचानक यूँही जाग जाया करता हूँ अक्सर, माँ मुझे रात भर तेरा हाथ पकड़ के सो जाने दे. ये मखमली गद्दा अब मेरे बदन में गड़ने लगा है, माँ मुझे अपने साथ फर्श पे
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क्या हुआ गर ला इलाज हूँ,

गुज़रा है ज़माना इस बंद कमरे में टूटे हैं पंख मेरे फड-फाड़ा के बंद कमरे मे. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, स्वप्न नहीं रुके हैं मेरे इस बंद कमरे मे. सींचता हूँ रूह अपनी अनगिनत उन यादों से शब् टपकती है कमल पे डब-डबती उन यादों से. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, यादे
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तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देखते....

इस रोज़ के शोर ने मेरी आवाज़ छीनली है शायद, या टूट गयीं हैं वो कुछ बची हुई नाज़ुक तारें, तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देखते.... रिश्ते में हमारी, ठंडक और धुंध पड़ गयी है शायद, या दूर से आती रौशनी हमे अँधेरे का तोफा दे गयी है, तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देख
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काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता, मैं रो़ज़ उससे तोड़ता तू रोज़ उसे सीती. यूँही सिलसिला सालों चलता, ये अमावस यूँही इतनी लम्बी न हुई होती.... -- नीरज
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लाचारी

छोटी छोटी आँखों से उम्मीद को रोज़ झांकते देखता हूँ, आस के चमकीले कणों से सने हाथ छिले देखता हूँ. अंगार सी सड़क पे नंगे पैर बचपन झुलसते देखता हूँ, थर-थराती सर्दी में नंगे जिस्मों को सिकुड़ते देखता हूँ. नन्हे कंधे स्कूल के बस्ते से नहीं मजदूरी के बोझ से
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-- शुभ दीपावली --

रौशनी का पर्व है आया इस वर्ष फिर से. घर-घर, गली-कूचे रंगों से चमके हैं रौशनी से दमके हैं. गली-कूचे कुछ ऐसे भी हैं जो चमके हैं न दमके. आओ रौशनी का एक दिया उस अँधेरी चौखट पे रखदें. कुछ अँधेरी ज़िन्दगियों को इस पर्व पे रोशन करदें. -- शुभ दीपावली -- --नीर
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एक ख्वाब...एक सवाल...एक दुआ...

ए महबूब मेरे तू मेरी यादों में है, मेरे ज़हन में है, मेरे ख्यालों में है. पहर दर पहर यूँही गुज़र जाते हैं, तू ज़बान में है, मेरी आँखों में है. परेशान सी है कुछ मैंने सुना है, घर लाने का तुझे सपना बुना है. डरता हूँ समाज से अपने मैं भी, ज़िक्र पे तेरे मै
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कश्मीर

चांदी सी रोशन वादी सुर्ख लाल हो गयीं हैं, सरहदें जोड़ती झेलम, वादी में मौन हो गयी है रहती थी जो अमन से यहाँ जाने कहाँ वो शान्ति खो गयी है. लगी है शायद नज़र कांगडी को आंच से वो अब अंगार हो गयी है. डल के शिकारों से बहती मोहब्बत जिहाद का शिकार हो गयी है.
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