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विद्रोही गुलजार : ठोक दे किल्ली (रावण)

गुलजार साब ज्यादातर शांत, धीर गम्भीर और कभी कभी विनोदी मूड में भी पाये जाते हैं। उनके लिखे ज्यादातर गीतों से उनके रोमांस की समझ का पता चलता है। उनकी कल्पना तो कहीं से कहीं पहुँच ही जाती है और कई बार तो सुनने और पढ़ने वाले को उनकी लिखी पंक्तियों का अर्थ
 
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City of Gold (2010) : अमीरी गरीबी की राजनीति

उदारीकरण के बाद से हिन्दी सिनेमा ने गरीब और अमीर के बीच के अन्तर को दर्शाती हुयी फिल्में बनाना बंद कर दिया था और धीरे धीरे गरीब मेन स्ट्रीम हिन्दी सिनेमा की कहानियों से धीरे धीरे गायब ही हो गया। गरीब, किसान और मजदूरों को ऐसे दुर्भाग्यशाली चरित्र मान लिया
 
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Paathshaala(2010):अच्छे विषय पर औसत फिल्म

पाठशाला (2010): अच्छे विषय पर एक औसत फिल्म पिछले लगभग 25 सालों में भारत का शिक्षातंत्र गिरावट की ओर तेजी से अग्रसर होता रहा है। जैसे जैसे प्राइवेट सैक्टर की भागीदारी शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ी है उसमें भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। स्कूल, कालेज अपनी मनमानी करते
 
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Phhoonk 2 (2010): डर कर दिखाओ

फूँक 2 : हिम्मत है तो डर कर दिखाओ किसी भी अच्छी हारर फिल्म का मूल मंत्र होता है कि कथानक में ऐसे दृष्य होते हैं कि फिल्म के पात्र प्राकृतिक रुप से कुछ घटनाओं के कारण डरते हैं और उनके साथ होने वाली घटनाओं को निर्देशक इस तरह से पेश करता है कि चरित्रों [...]
 
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Road Movie (2009): ज़िन्दगी एक सफर है

रोड मूवी : ज़िन्दगी एक सफर है प्रेम को जानने के लिये प्रेम को अपने जीवन में महसूस करना जरुरी है और केवल पढ़ कर या सुनकर इसके बारे में ढ़ंग से नहीं जाना जा सकता। प्रेम को जीकर ही जाना जा सकता है। ज्यादातर मानवीय भावनायें ऐसी ही हैं कि जब तक उनसे खुद [...]
 
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Prince (2010) : बेहद कमजोर थ्रिलर

प्रिंस (2010) : बेहद कमजोर सस्पैंस थ्रिलर आज के दौर में करोड़ों की लागत से प्रिंस जैसी हिन्दी फिल्म बनाना रिस्की है और अर्थशास्त्र से सम्बंधित ये रिस्क और भी बढ़ जाता है जबकि फिल्म उन विदेशी फिल्मों के मुकाबले में कहीं ठहरती ही नहीं जिनसे प्रेरित होकर इसका
 
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वेल डन अब्बा (2010) : गरीबी और सिलिकॉन इम्प्लान्ट्स के बीच फँसा देश

वेल डन अब्बा : अभाव और समृद्धि के निर्लज्ज प्रदर्शन के पाटों के बीच पिसता भारत श्याम बेनेगल इस फिल्म में भ्रष्ट भारतीय समाज में समस्यायों से दो चार होते एक सामान्य से मनुष्य की कहानी दिखाते हैं जो शुरु में तो एक सीधे से साधारण मानव की भाँति भ्रष्ट तंत्र
 
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जाने कहाँ से आयी है (2010)

जाने कहाँ से आयी है : क्यूँ बनायी जाती हैं ऐसी फिल्में? सन 2000 में हालीवुड से एक फिल्म आयी थी What Planet You are from, जिसमें दूसरे ग्रह पर रहने वाले लोग अपने एक साथी को धरती पर भेजते हैं जहाँ उसे किसी भी महिला के साथ सम्बन्ध बनाकर एक बच्चे को जन्म
 
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जनम(1985): महेश भट्ट की सबसे संवेदनशील फिल्म

जनम : महेश भट्ट की सबसे संवेदनशील फिल्म यूँ तो महेश भट्ट ने इंसानी जीवन में जटिल रिश्तों की मौजूदगी पर हमेशा बेहतरीन फिल्में बनायी हैं जिनमें अर्थ, सारांश, जनम, नाम, काश, डैडी, तमन्ना और जख्म आदि महत्वपूर्ण हैं। इनमें भी अर्थ, जनम और जख्म को उनके अपने ही
 
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इस हफ्ते की फ़िल्में...

इस हफ्ते तो कमाल ही हो गया है, टाईम्स ऑफ़ इंडिया में आज तीन फिल्मों की समीक्षा निकली है और तीनों को ही अच्छा या बेहतर बताया गया है। "ढोल", "लोएँस ऑफ़ पंजाब" तथा "मनोरमा - सिक्स फ़ीट अन्डर"। उसमें से पहली दो कॉमेडी हैं। आजकल कॉमेडी फ़िल्में भी काफी चल
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