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आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं ||

आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं | बेवजह समझा रहा हूँ ख़ुद को मैं || गैर भी तलबगार मेरे होते थे कभी | फिर से ये बतला रहा हूँ ख़ुद को मैं || बेखयाली एक वजह थी गम का मेरे | रोज़ ये दोहरा रहा हूँ ख़ुद को मैं || अब भी मुझको दिखती है उम्मीद उसमें | इस कदर
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प्यारा सा बचपन

लगता है ज्यों कल ही खिला था, बंद कली सा जो सिकुङा था , पंखुङियों पर पङी ओस पर, चंचल रविकर चमक उठा था, सात रंग की विभा समेटे माँ के आँचल में सिमटा था , वो मेरा प्यारा सा बचपन, पावस सा लुकता छिपता था। नहीं मिला जब कोई बहाना,मजबूरी थी शाला जाना, वहाँ पह
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