आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं ||
आज फिर अपना रहा हूँ ख़ुद को मैं | बेवजह समझा रहा हूँ ख़ुद को मैं || गैर भी तलबगार मेरे होते थे कभी | फिर से ये बतला रहा हूँ ख़ुद को मैं || बेखयाली एक वजह थी गम का मेरे | रोज़ ये दोहरा रहा हूँ ख़ुद को मैं || अब भी मुझको दिखती है उम्मीद उसमें | इस कदर
Dec 09 2009 01:06 AM



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