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मेरा कमरा...जीवन

मेरा कमराऔर मेरी याददाश्तदोनों हैं भरेसड़ी घुटन से,उनके बीच मेंमैं रहता हूँ....बदलते मौसमऔर गुजरते दिनलाते रहे हैंकितने बदलाव,अच्छे और बुरेमैं छांटता हूँ...कडवी यादों कोमिटा सकूँजेहन सेकिसी तरह,इसी प्रयास मेंमैं रहता हूँ...सुनहले पलों कोघर में अपनेसजा
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मेरी कविता के बिखरे टुकड़े...

1.पतंग डोर मेरे हाथ मेंसरसर उड़ती पतंग,जैसे ईश्वर और इंसान का संग।2.पंखापंखा घूमें कमरे मेंहवा में फैले तरंग,जैसे कर्म भाग्य का संग।3.शराबतन में उतर कर शराबतनकर बाहर आए,जैसे सफलता इतराए।4.अखबारआजकलमैं पढता नहीं अखबार,एक ही ख़बरबार-बार।
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अश्कों के मायने अलग होते !!!

रहमोकरम पे आपके/हमने गुजारें हों/कुछ पल अगर,यूँ ना समझना/सुकून से जीकर/मर सकें हैं हम।टूटते रहे थे/मेरे आसमान के तारे/एक-एक कर,रौशनी की लकीर/दीखती न थी,बढ़ता जाता था/अंधेरे का डर।अजीबोगरीब हुए हादशे/जिंदगी में हमारे/यकीन ना होगा,तबियत से
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स्वतंत्र हैं हम?

मैंने यह कविता १९९२ में लिखी थी...इसे मैं अपनी पहली कविता कह सकता हूँ ... यह हिंदी-युग्म के काव्य-पल्लवन पे भी छाप चूका है...एक बार इस ब्लॉग पर भी लिखा था परन्तु आप लोगों की नज़र में नहीं आ पाई...पुन: आपकी आलोचना-प्रसंशा हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ....आश
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चौराहा पे राही

हर वक़्त ख़ुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूँ, टार्च पास नहीं, अंधेरे में भटक जाता हूँ। जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए, हम नए राह की खोज में पिछरते चले गए। वक्त का तकाजा समझा मैं ठोकरों के बाद लहूलुहान थी शख्सियत, खुले थे मेरे हाथ। गर चाहते हो तुम, दामन
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फांस

लगी पलंग टटोलने, व्याकुल होकर आज। उठी तुंरत विचारने, रात्री के परिहास॥ कहीं मतंग तरंग में, निकली ऐसी बात। लगी पिया के ह्रदय, गहरी कोई फांस॥ चली भ्रमित देखने, रुकी हुई है साँस। लगी भयभीता फिरने, बुझी हुई है आस॥ तभी किचन की ओर से, आई एक आवाज। बर्तन सार
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महफ़िल में दिवाने आए हैं

दस्तूर-ऐ-इश्क निभाने आए हैं, लो आज महफ़िल में दिवाने आए हैं। दुल्हन बनी आप सजी हैं गहनों से, खूने-जिगर मांग सजाने आए हैं। जज्बात में जोश भरा था तुमने भी, मदहोश ऐ हुस्न जगाने आए हैं। बदनाम है प्यार जमाने में काफ़ी, तस्वीर की ओट दिखाने आए हैं। मंजूर है
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