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तुमने जिनको छू लिया.....
हम लकीरों से उलझकर जब कभी बेघर हुए। चल के तपते पत्थरों पर, चांदनी के दर हुए। उनकी आँखों से छलक आयीं दो बूंदें गाल पर, ख़्वाब उनके भी लो अब, नमकिनियों से तर हुए। यूँ तो साहिल पर पड़े थे, सदियों से पत्थर कई, तुमने जिनको छू लिया वो टुकड़े संग-मरमर हुए। बीते
Jun 15 2010 11:00 AM



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