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तुमने जिनको छू लिया.....

हम लकीरों से उलझकर जब कभी बेघर हुए। चल के तपते पत्थरों पर, चांदनी के दर हुए। उनकी आँखों से छलक आयीं दो बूंदें गाल पर, ख़्वाब उनके भी लो अब, नमकिनियों से तर हुए। यूँ तो साहिल पर पड़े थे, सदियों से पत्थर कई, तुमने जिनको छू लिया वो टुकड़े संग-मरमर हुए। बीते
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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चाँद की भी इमेज है मुझ-सी...

बहती आँखों से बयाँ होता है. दर्द जब दिल की जुबाँ होता है. जब भी जी चाहे, ख़ुदकुशी कर लो, भीतर इक गहरा कुआँ होता है. जब सुलगती है ग़ज़ल सी दिल में, सर्द मौसम में धुआँ होता है. अपने चेहरे पे बारहा मुझको, तेरी आँखों का गुमाँ होता है. रूह की साँस चलती रहती
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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गज़ल क्या है

सुबह के इन घंटों को गुरुदेव चौपाल काल कहा करते हैं। इन्ही घंटों में उनके तमाम शिष्य गण उनके दर्शन कर अपनी जो भी शंकाऐं होते हैं उनके सामने रखते हैं और गुरुदेव अपनी सामर्थ्य भर उनका निवारण करने की कोशिश करते हैं। आज भी रोजाना उनके दरबार में हाजिरी लगाने
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उम्र पूरी घुल गयी है....

अब लट कोई माथे पर झूलती ही नहीं है। ये गिरह तेरी यादों की खुलती ही नहीं है। भूला हूँ मैं हर बात, तेरी याद भुलाने, क्या चीज़ मुहब्बत है, भूलती ही नहीं है। मैंने कभी सोना, कभी यह ज़िस्म रखा था, रूह तुमने जो रखा है, वो तुलती ही नहीं है। है दर्द की डली सी, इस
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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तेरी बातें पकी निम्बोली सी....

कभी गुस्सा कभी ठिठोली सी। तेरी बातें पकी निम्बोली सी। मेरा चेहरा हुआ तेरा चेहरा, मेरी बोली भी तेरी बोली सी। जाने क्या देखा तुमने आँखों में, हुई रंगीन तुम तो होली सी। चाँद भी खिलखिला के हंस बैठा, तू भी शरमाई बन के भोली सी। बजी पायल तुम्हारी दुल्हन सी, हुई
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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सुना है इश्क - मुहब्बत में भी लू लगती है....

मुझको अक्सर गर्म हवा सी तू लगती है। सुना है इश्क़-मुहब्बत में भी लू लगती है। चाँद, समंदर, बारिश, कलियाँ, तितली, धूप, मुझको हर इक शय में तू ही तू लगती है। पेड़ों को पानी देना जब से सब भूले, तब से देखा तपी- तपी सी भू लगती है। चाँद की आँच में सपनों के भूने
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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फूलों वाला चाँद टंगा था......

मुझको मेरे दिल ने ठगा था। वरना तो मैं रचा-पगा* था। उसकी मूंदी पलकों में भी, जैसे कोई ख़्वाब जगा था। रात के जुड़े में इक पूरा, फूलों वाला चाँद टंगा था। इश्क में मरने से कुछ थोडा, जीने का अहसास जगा था। सुबह तलक लौटा लायेगा, सूरज लेकर चाँद भगा था। *रचा-पगा =
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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मैं मुहब्बत बन गया हूँ, डर सा हूँ मैं.....

त्रिवेणी के लिए lines लिखी थी ......बदल कर ग़ज़ल हो गयीं .....तुम्हारी मुहब्बत को यूँ तरसा हूँ मैं.बनकर ओस निगाहों से बरसा हूँ मैं.कुछ खिड़कियाँ हैं, दरवाजें हैं, दीवारें भी,कब तुम्हारे बिना इक घर सा हूँ मैं.मुझको क़त्ल करने लगी हैं चौपालें भी,मैं मुहब्बत
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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सभी मिट्टी के घरौंदे टूट गए :गज़ल

तरस गए शब नींद को तश्नगी से लब तरस गए नाखुदा ने पुकार भी कि कई अब्र फिर भी बरस गए
 
kanishka kashyap
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ग़ज़ल

आग की आँख में पानी की तरह।आँख का नूर निग्हेबानी की तरह।हर हथेली में रस्म जि़न्दा है,दोस्त रिश्तों की रवानी की तरह।रेत में दूब, दूब में दरियाएक मुसलसल–सी कहानी की तरह।धूप धरती की पाँव बच्चे का,सुर्ख़ सूरज पे निशानी की तरह।आँत में रात है ब्यालू का बखत,
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Zabte gham

आँखों से गिरते ashak को बूँद शबनम की कहे जाते हैं जब्त ए ग़म की आदत है हम यूँ ही जिए जाते हैं । गर न मिले सर रखने को शाना बहाने का अश्क भला फिर क्या मजा। रख हाथ गेरों के शाने पर हमयूँ ही थिरकते जाते हैं जब्त ए ग़म की आदत है हम यूँ ही जिए जाते हैं। हो
 
shikha varshney
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Aarzoo

रो रो के धो डाले हमने, जितने दिल में अरमान थे। हम वहाँ घर बसाने चले, जहाँ बस खाली मकान थे। यूँ तो दिल लगाने की, हमारी भी थी आरज़ू, ढूँढा प्यार का कुआँ वहाँ, जहाँ लंबे रेगिस्तान थे। हम तो यूँ ही बेठे थे तसव्वुर में किसी के, बिखरे टूट के शीशे की तरह कि
 
shikha varshney
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बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को संगी बना न लेना बरसात के पवन को । वह ही तो है तुम्हारा उसके तो तुम नहीं हो बेचैन कर रहा क्यों समझा दो अपने मन को । न नदी में बाँध बाँधो मर जायेगी बिचारी कितनी विकल है धारा निज सिन्धु से मिलन को । तूँ पुकारता चला चल
 
हिमांशु । Himanshu
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gazal

मुझे गज़ल लिखनी नही आती कोशिश की है अगर इस पर प्रतिक्रिया देते समय कोई मुझे इसमे गलती बतायेगा तो मुझे बहुत खुशी होगी उसका उपकार्र मानूँग क्या कोई मेरी कलम को प्रेरित कर्ने और दिशा देने की कृ्पा करेगा? गज़ल बुज दिली कहो या कहो तकदीर लाँघ सकी ना हाथ की ए
 
Nirmla Kapila
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gazal

गज़ल मेहरबानियों का इज़हार ना करो महफिल मे यूँ शर्मसार ना करो दोस्त को कुछ भी कहो मगर दोस्ती पर कभी वार ना करो प्यार का मतलव नहीं जानते तो किसी से इकरार ना करो जो आजमाईश मे ना उतरे खरा ऐसे दोस्त पर इतबार ना करो जो आदमी को हैवान बना दें खुद मे आदतें शुम
 
Nirmla Kapila
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gazal

गज़ल मेहरबानियों का इज़हार ना करो महफिल मे यूँ शर्मसार ना करो दोस्त को कुछ भी कहो मगर दोस्ती पर कभी वार ना करो प्यार का मतलव नहीं जानते तो किसी से इकरार ना करो जो आजमाईश मे ना उतरे खरा ऐसे दोस्त पर इतबार ना करो जो आदमी को हैवान बना दें खुद मे आदतें शुम
 
Nirmla Kapila
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gazal

गज़ल् ज़िन्दगी ये कैसा दगा दिया तुम ने आदमी से आदमी ज़ुदा किया तुमने चौपालो की रोनक छर्खों की गुंजन नये दौर मे सब कुछ भुला दिया तुमने सावन के झूले वो पनघट की सखियां जीने की अदा को मिटा दिया तुमने सजना की चिठी वो प्यारा कबूतर भूला सा अफसाना बना दिया तुमन
 
Nirmla Kapila
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