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छोटी-छोटी बातें

नहीं। वे तीनों परिहास नहीं कर रहे थे। उपहास तो बिलकुल ही नहीं कर रहे थे। मुझे आकण्ठ विश्वास और अनुभूति है कि वे तीनों मुझे भरपूर आदर और सम्मान देते हैं। हाँ, साप्ताहिक उपग्रह में मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में मेरे लिखे पर तनिक विस्मित होकर
 
विष्णु बैरागी
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सुख-दुख की साझेदारी का रिश्ता [बकलमखुद-125]

…अब लगता है कि नितांत सहज जान पड़ने के बावजूद कॉमरेडशिप एक तरह की शर्त पर टिका हुआ संबंध है- विचारधारा की शर्त, जिसके मायने और खास तौर पर आग्रह-दुराग्रह लगातार बदलते रहते हैं। … चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया।
 
अजित वडनेरकर
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पुन: सुषुप्तावस्था में न जाए महाराष्ट्र सरकार ...!

चार घंटे, सिर्फ चार घंटे में राहुल गांधी ने यह सिद्ध कर दिया कि शिवसेना के बालठाकरे, पुत्र उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे अपने दरबे मात्र में दहाडऩे वाले शेर, बल्कि कागजी शेर हैं। ठाकरे के 6 बंद मुठ्ठियों को राहुल ने एक झटके में खोल डाला। अब चाहे ठाकरे
 
एस.एन. विनोद !
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स्वर्गीय लोहिया साहब - रामधारी सिंह 'दिनकर’

डॉक्टर राममनोहर लोहिया से मेरी पहली मुलाकात सन् 1934 या 35 में पटना के सुप्रसिद्घ समाजवादी नेता स्वर्गीय फूलन प्रसाद जी वर्मा के घर पर हुई थी और हम लोगों का परिचय मित्रवर श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने करवाया था। उस समय लोहिया साहब मुझे उद्वेगहीन, सीधे सादे
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari
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मैंने लाखो के बोल सहे --सितमगर तेरे लिए

निर्मला देवी की खनकती आवाज में जो जादू है उसे तो सुनकर ही जाना जा सकता है |कल आपके सामने अंतिम पेशकश करूँगा |कल ही सुनलेना |Go To FileFactory.com
 
abhay lokre
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कुम्‍भ में नयनसुख

हरिद्वार एक स्‍नान-प्रधान या कहिये नहान-प्रधान शहर है। यहां दुनिया भर से आस्तिक लोग नहाने आते हैं। जो आस्तिक नहीं हैं वे नहान देखने आते हैं यानी नहाते हुओं को देखने के लिये आते हैं। वे नहानेवालों को देखते हैं। और नहाते हुओं को देखने वालों को भी देखते
 
डॉ. कमलकांत बुधकर
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जुरी चिट्ठे में जालसाज़ी की गयी है

मैंने पिछली बार बताया था कि ९ अश्वेत लोगों पर, दो श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार करने के लिये तीन बार अलग अलग मुकदमा चला था। पहली बार, यह ऐलाबामा के स्कॉटस्बॉरो शहर में चला था। इसलिये इस मुकदमें को स्कॉटस्बॉरो  बॉयज़ ट्रायल के नाम से जाना जाता है।
 
उन्मुक्त
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अ फ्राईडे (अ वेडनेसडे कि तर्ज पर एक साफ्टवेयर कंपनी में)

प्रोजेक्ट मैनेजर राठौर - कौन हो तुम..??? क्या पहचान है तुम्हारी ?फोन से - कौन हूं मैं!! मैं वो हूं जो आज कमिटमेंट करने से डरता है, मैं वो हूं जो आज घर जाने से डरता है, ये सोच कर की कहीं घर वाले पहचानने से इंकार ना कर दें...मैं वो हूं जो, आज जॉब चेंज करता
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हरामी..?

राजकुमार सोनीकौन हूं मैं। फिलहाल तो मेरा कोई नाम नहीं है, और लोगों की तरह आप भी मुझे हरामी कह सकते हैं। हरामी यानी हराम का जना हुआ। लेकिन जरा इस चित्र को गौर से तो देखिए। हूं न, काला टीका लगाकर चुम्मी लेने के लायक। तो आज मैं इस चित्र से बाहर निकलकर आपसे
 
राजकुमार सोनी
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आंटी ! प्लीज मुझसे बात कीजिए।

आंटी प्लीज मुझसे बात कीजिए। मेरा मन कह रहा था कि आंटी में झकझोर कर कहूं। रजाई में से थका सा चेहरा निकलकर आंटी ने हमारे साथ गए कारीगर को कहा, इन लोगों को घर में दिखा दे, जो देखना चाहते हैं। दरअसल हम अपने घर के लिए डिजायन देखने ठेकेदार के आदमी के साथ एक
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कीचड़ में खेलता वो मासूम सा बच्चा

एक फूल सा बच्चा, गली में खड़े पानी के कारण हुए कीचड़ के बीचोबीच मस्ती कर रहा है। उसको कितना आनंद महसूस हो रहा था, उसका तो अंदाजा नहीं लगा पाऊंगा। हाँ, लेकिन उसके चेहरे की खुशी मेरे दिल को अद्भुत सुकून दे रही थी। उसको कीचड़ में उछल कूद करते देख, घर के भीतर
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बइयाँ ना मरोड़ो बलमा..............घुघूती बासूती

अवैधानिक चेतावनी: ज्ञान पिपासु फिर कभी आएँ जब ज्ञान वार्ता हो रही हो। खेद है कि आज ज्ञान की दुकान बन्द है। आज अगम्भीर चिन्तन दिवस है।प्लास्टर उतर गया, जमकर रगड़ा लग गयाऔर हम खड़े खड़े, हॉस्पिटल में पड़े पड़ेहाथ खूब मुड़वाते औ तुड़वाते रहे।हाय रे मानव! तू सदा
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वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 15 - धूप खिली जिस्म गरम सा है, सूरज यहीं ये भरम सा है..

फिल्म जगत में बहुत से तो नहीं, पर कुछ पटकथा लेखक जरूर हुए हैं जिन्होंने बतौर गीतकार भी नाम कमाया है। गुलज़ार से तो हम सब वाकिफ़ हैं ही। जावेद साहब ने भी सलीम के साथ कई यादगार पटकथाएँ लिखी पर अपने गीतकार वाले रोल में तभी आए जब पटकथा लेखन का काम उन्होंने
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पिछली तारीख के आइनों का डीप फ्रीजर

चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "? कल रात हम उंघियाये
 
डॉ .अनुराग
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तिरंगे में सफ़ेद रंग “क्रिश्चियनिटी” का होता है और “जन-गण-मन” की धुन पर पोप की प्रार्थना…… Mockery of National Flag, National Anthem by Missionary

[डिस्क्लेमर – मुझे मलयालम नहीं आती, इसलिये प्रस्तुत पोस्ट एक मलयाली मित्र द्वारा दी गई सूचनाओं पर आधारित है… जिसे मलयालम आती हो, कृपया इसकी पुष्टि करें…]बचपन से मैंने तो यही पढ़ा था कि देश के तिरंगे में भगवा रंग त्याग और बलिदान का, सफ़ेद रंग शान्ति का तथा
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पाक में जेहाद के नारे, भारत में पाक से गुफ्तगू की तैयारी

उधर न्यूयार्क से खबर आई- ‘भारत के खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल कर रहा है पाक।’ इधर दिल्ली की खबर है- ‘भारत फिर से गुफ्तगू को तैयार।’ शर्म-अल-शेख में गड़बड़झाले के बाद पीएम ने संसद में वादा किया था- ‘बिना ठोस कार्रवाई का सबूत
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घातक है संकीर्ण राजनीति का विष

सपनों के शहर मुंबई में इससे पहले ऐसा वातावरण कभी नहीं था। एक अंजान सी चेतावनी हमेशा कानों से टकराती रहती है। घर से बाहर न निकलो। घर में दुबककर रहो। घर से बाहर सड़क पर जाओगे तो वो दूसरे के क्षेत्र में होगा। सड़क के पार जाओगे तो वो भी किसी और का दायरा
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महंगाई कम करने का नया नुस्खा …

यह आप पर है, भाव घटाने के लिए जो चाहे करें. बस याद रखना आपने मुझ पर जवाबदारी डाली तो मैं आप को लपेट लुंगा. कोई उपाय ध्यान में है? है ना, उपाय तो है ही. बताओ.....
 
संजय बेंगाणी
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कहाँ है आज वसन्त की मादकता?

वसन्त ऋतु है अभी! किन्तु मुझे तो मादकता का किंचितमात्र भी अनुभव नहीं हो रहा है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जो कि वसन्त के श्रृंगार माने जाते हैं, तो कहीं दृष्टिगत हो ही नहीं रहे हैं। कहाँ हैं आम के बौर? कहाँ गई कोयल की कूक? यह वसन्त का लोप बड़े नगरों
 
जी.के. अवधिया
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कौंग्रेस की इस राजनीति पर तथाकथित सेक्युलर खामोश क्यों ?

यह तो सभी जानते है कि 'फूट डालो और राज करो', यह गुरु-मन्त्र तो कौंग्रेस को विरासत में अंग्रेजो से मिला था, मगर वोट के लिए वे इतने छोटे दर्जे की राजनीति पर उतर आयेंगे कि इनके सिपहसलार यह भी भूल जांए कि उनके इस गैर-जिम्मेदाराना कदम से देश की सुरक्षा पर
 
पी.सी.गोदियाल
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आपका फिर व्यर्थ है कहना लिखूँ मैं गीत कोई

शब्द से होता नहीं है अब समन्वय भावना कारागिनी फिर गुनगुनाये, है न संभव गीत कोईखो चुकी है मुस्कुराहट, पथ अधर की वीथिका कानैन नभ से सावनी बादल विदा लेते नहीं हैंकंठ से डाले हुए हैं सात फ़ेरे सिसकियों नेपल दिवस के एक क्षण विश्रांति का देते नहीं हैटूट बिखरी
 
राकेश खंडेलवाल
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