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Football fever

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कई सवालों के घेरे में है भाजपा

जब लालकृष्ण आडवाणी आगे हाथ जोड़े रथ यात्रा में निकले थे, तो हजारों लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था। मैं भी भीड़ के एक कोने से लालकृष्ण  आडवाणी को देखकर रोमांचित हुआ था। मन में कई सपने जगे थे। एक सपना था कि कम से कम भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में
 
prabhat gopal
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क्या रैलियों में आम आदमी होता है?

कभी-कभी सोचता हूं कि अगर हमारे देश से गरीबी, भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी खत्म हो जाए तो इन नेताओं की गाड़ी कैसे चलेगी? ये कैसे विधायक, मंत्री और न जाने क्या-क्या बन कर लालबत्ति की गाड़ी से सायरन बजाते हुए जाएंगे और आएंगे? कैसे इनके चेहरे की लाली और बैंक
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क्या संघ से शास्त्रार्थ कर सकेगी बीजेपी की नयी पौध?

लाल कृष्ण आडवाणी का जाना तय था। दिन तय नहीं था। शुक्रवार को शुभ घड़ी में आखिरकार उनकी विदाई पर भी मुहर लग गयी। बतौर लीडर ऑफ ऑपोजिशन उनकी विदाई के साथ संघ परिवार के मुखिया ने नया पार्टी अध्यक्ष भी तय कर दिया। बावन साल के ‘युवा’ नेता नितिन
 
प्रभात शुंगलू
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टूटते क़िले के संरक्षक

नितिन गडकरी को बीजेपी का वो जहाज़ मिला है... जिसमें कई छेद हैं... और अब इस नए कप्तान के सामने चुनौती है कि वो इस जहाज़ को डूबने से कैसे बचाए... हालांकि इससे पहले पुराने कप्तान जब एक छेद बंद करते तो दूसरे छेद से कमल के जहाज़ में पानी घुसने लगता था...
 
Madhaw Tiwari
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चलो अब सब अच्छा होगा

तुलसीदास जी ने सालों पहले ही लिख दिया था- कोउ नृप होई हमइ का हानी, चेरि छोडि़ होबई ना रानी। मेरे जैसे देश के करोड़ों आम आदमियों के लिए हालात आज भी वैसे ही हैं, जरा भी नहीं बदले। 26 साल की उम्र में मैंने केंद्र में सरकारें बदलती देखीं, राज्य में सरकार
 
प्रदीप कुमार
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84 भूल जाते हैं, लेकिन 2002!

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल लुधियाना में एक बात कही. उन्होने कहा कि 1984 के सिख विरोधी दंगे एक दुखद हादसा है लेकिन इसे हमेशा जीवित नहीं रखा जाना चाहिए. प्रधानमंत्री के शब्दों में : “लेकिन कुछ लोग अपनी दुकान चलाने के लिए इस किस्से को हमेशा जिंदा रख
 
पंकज बेंगाणी
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ढूंढो सोनिया पाओ आडवाणी!

क्या आपने हाल ही में गूगल पर “सोनिया गांधी” सर्च किया है? यदि नहीं, तो एक बार करिए! आप पाएंगे कि सोनिया गांधी के साथ साथ आडवाणीजी भी आपकी सेवा में हाजिर हो जाएंगे [ प्रायोजित कडी के रूप में] और कुछ ऐसे संदेश देंगे कि आप सोचने लग जाएंगे कि
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भइया नक्को, बहिनजी पाहिजे

महाराष्ट्र की राजनीति में दलित मुद्दे का मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कम नहीं है। बसपा यहाँ पवार, ठाकरे, चव्हाण जैसों का दबदबा खत्म कर सकती है।
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शेखावत चले भुनाने

क्लास में बच्चों को कहावतें समझा रहा था। बच्चो वह कहावत सुनी है ना घऱ में नहीं हैं दाने, अम्मा चली भुनाने-मैंने क्लास में पूछा। हां, तो भुनाने के लिए दाने पास होना जरुरी थोड़े ही है। अम्मा क्रेडिट कार्ड से उधार दाने ले लेंगी और भुनाने चली जायेंगी। कह