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निर्माण कृति का
क्यों निर्माण करना चाहता हूँ उस कृति का जो मुस्कुराये खिलखिलाये प्रकृति के साथ हर कदम हो पूर्ण यौवन का कदम चले तो द्वार खुलें प्रगति के रुकना भी हो एक विशेष अनुभूति से परिपूर्ण मैं जानता हूँ मजबूर कर दिया जाऊँगा इन्ही कुंठाओं में जीने के लिये जो मैने खुद
May 14 2010 01:26 AM



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