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वो मिट्टी तुझे बुलाती है

I wrote this for Dr Ghazal Srinivas and am thankful to him for singing it in Afghanistan during his peace mission. वो मिट्टी तुझे बुलाती है माँ की सूनी सी आँखें तेरी राह में बिछती जाती है चौखट की हर आहट पे जो तुझको ध्यान में लाती है घर आ जा मेरे बच्चे अब
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याद आते रहे, दिल दुखाते रहे

याद आते रहे, दिल दुखाते रहे वो रह रह के हमको सताते रहे शक्ल अपनी ही लगने लगी अजनबी आईने उलझनों को बढ़ाते रहे वो नज़रें झुकाने की उनकी अदा हम फ़रेबेमोहब्बत को खाते रहे जिस से गुज़रे थे हम सैकड़ों मर्तबा हमारी मंज़िल वहीं वो बताते रहे ऐसा छाया अंधेरों का हम पर
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किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं

किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं हम तो तेरी वफ़ा से ड़रते हैं दुश्मनों का तो हम को ड़र ही नहीं दोस्तों की दुआ से ड़रते हैं इश्क़ होने का हमको ख़ौफ़ नहीं हम तो बस इंतेहा से ड़रते हैं किसी इन्सान से घबराएं क्यों वो के जो बस ख़ुदा से ड़रते हैं आप से प्यार है
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तर्क़ेवफ़ा का दिल पे असर है

तर्क़ेवफ़ा का दिल पे असर है रात कटी तो सहर का ड़र है बड़े शौक़ से फूँक चले हो सोच तो लेते किसी का घर है जान भी आपके नाम लुटा दी प्यार की कोई और कसर है आज ज़माना मुझसे ख़फ़ा है ये सेहरा भी आपके सर है इतना तो बतलाते जाओ क्या दिल मेरा राहगुज़र है सबको पता