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१४११ (चौदह सौ ग्यारह) बचे हैं, तुझे मिला के, मुझे मिला के |

१४११ (चौदह सौ ग्यारह) बचे हैं, तुझे मिला के, मुझे मिला के | तुम शावक व्याघ्र हो, मैं वयस्क हूँ कुछ बूढ़े हैं, कुछ हम जैसे हैं गिनती के अब कुछ ही बचे हैं, तुझे मिला के, मुझे मिला के || पर कुल का, पर, निज जाति का है तू सहज वृत्ति कि, तेरा
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1411: क्या दादाजी, एक बचा कर नहीं रख सकते थे?

बेकाबू बढ़ती आबादी. फिर भी सेक्स पावर में कहीं कमी सी महसूस होती है. शेर सी ताकत के लिए बाघ के नख से लेकर दाँत-आँत-आँख-अंडाशय, सब चबा गया इनसान.
 
संजय बेंगाणी