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लिपस्टिक की लेडीफिंगर समझने की मुश्किल!

आम आदमी और आम बजट की शायद यही नियति है। हमेशा उम्मीद की जाती है कि शायद अब ये संघर्ष कर खुद को ख़ास बना लें, लेकिन नहीं। बजट और आदमी ने खुद के आम होने को स्वीकार कर लिया है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इतनी बार छले जाने के बावजूद आम आदमी ने बजट से फिर
 
नीरज बधवार
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नाम में क्या नहीं रखा! (हास्य-व्यंग्य)

नाम में क्या नहीं रखा!जैसे ही नर्स डिलिवरी रूम से निकल ये बताती है कि ठाकुर साहब लड़का हुआ है, ठीक उसी समय इस सवाल की भी डिलिवरी हो जाती है कि बच्चे का नाम क्या रखा जाए? मौजूदा समय में बच्चे का नाम रखना उसे पैदा करने से भी कहीं बड़ी चुनौती है। मां-बाप
 
नीरज बधवार
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मेरी सम्पत्ति घोषणा! (हास्य-व्यंग्य)

हाल-फिलहाल वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापों के बाद से मैं काफी सहम गया हूं। उससे पहले मधु कोड़ा के यहां हुई छापेमारी में भी मुझे काफी घबराहट हुई थी। रोज़-रोज़ के तनाव से तंग आकर मैंने तय किया है कि हाईकोर्ट के जजों की तर्ज पर मैं
 
नीरज बधवार
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चरित्रहीन चप्पल!

हिंदुस्तान में रहते हुए अगर आप रचनात्मक हो गए हैं तो इसे आपका दुस्साहस ही माना जाएगा वरना तो नई सोच पर हमारे यहां इतने पहरे हैं कि लकीर के प्रति फकीरी छोड़ना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि घटिया चुटकुलों, वाहियात फिल्मों, बेहूदा विज्ञापनों का हमारे यहां
 
नीरज बधवार
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महंगाई पीड़ित लेखक का ख़त!

सम्पादक महोदय,पिछले दिनों महंगाई पर आपके यहां काफी कुछ पढ़ा। कितने ही सम्पादकीयों में आपने इसका ज़िक्र किया। लोगों को बताया कि किस तरह सरिया, सब्ज़ी, सरसों का तेल सब महंगे हुए हैं और इस महंगाई से आम आदमी कितना परेशान है। ये सब छाप कर आपने जो हिम्मत दिखाई
 
नीरज बधवार
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चंचल बाला ठाकरे!

बचपन में गली क्रिकेट खेलते हुए हममें से बहुतों ने खुद को स्टार माना है। हद दर्जे की बेसुरी आवाज़ के बावजूद सिर्फ ‘स्टेज पर गा लेने की हिम्मत’ के कारण हम कॉलेज के किशोर भी कहलाए। कॉलोनी में एक-आध को चपत लगा हम मोहल्ले के दादा भी हुए। मगर मान्यता का यही
 
नीरज बधवार
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जिसके आगे न, पीछे ना! (हास्य-व्यंग्य)

टीवी खोलते ही जिस चैनल पर मैं रूकता हूं वो हरिद्वार से सीधी तस्वीरें दिखा रहा है। हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में लोग पवित्र स्नान कर रहे हैं। एंकर बताती है कि सुबह चार बजे से ही यहां स्नान करने वालों का तांता लगा है। देश भर से लाखों लोग पवित्र स्नान
 
नीरज बधवार
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मुहावरों में पिलती बेचारी सब्ज़ियां (हास्य-व्यंग्य)

बीवी ने अगर सब्ज़ी अच्छी नहीं बनाई तो आप किस पर गुस्सा निकालेंगे? बीवी पर या सब्ज़ी पर। निश्चित तौर पर बीवी पर। लेकिन, इस देश में मर्द चूंकि सदियों से बीवी से डरता रहा है, इसीलिए उसने चुन-चुन कर सब्ज़ियों पर गुस्सा निकाला दिया। यही वजह है कि ज़्यादातर
 
नीरज बधवार
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समस्या भी तो एक संभावना है।(व्यंग्य)

रेड लाइट पर रुकते ही मेरी नज़र सड़क किनारे पानी की पाइप लाइन पर पड़ती है। आज फिर इसमें लीकेज हो रहा है। पिछले एक महीने में ये नज़ारा मैं तीसरी बार देख रहा हूं। बड़ी-सी जलधारा फूट रही है और आसपास लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ है। एक भाई वहीं कपड़े धोने के
 
नीरज बधवार
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स्नानवादियों के खिलाफ श्वेतपत्र

सर्दी बढ़ने के साथ ही स्नानवादियों का खौफ भी बढ़ता जा रहा है। हर ऑफिस में ऐसे स्नानवादी ज़बरदस्ती मानिटरिंग का ज़िम्मा उठा लेते हैं। जैसे ही सुबह कोई ऑफिस आया, ये उन्हें ध्यान से देखते हैं फिर ज़रा सा शक़ होने पर सरेआम चिल्लाते हैं... क्यों..... नहा कर
 
नीरज बधवार
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खेल है झेल!

कहा जा रहा है कि फिरोजशाह कोटला मैदान में जो कुछ हुआ उसे भारत कलंकित हुआ है। जिस पिच पर ये मैच खेला गया, वो डीडीए की घटिया राजनीति से भी ज़्यादा बुरी थी। उस विकेट पर अगर कुछ देर और मैच होता, तो भारत-श्रीलंका के आपसी सम्बन्ध खतरे में पड़ सकते थे। 23 ओवर
 
नीरज बधवार
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दुर्घटना से देर भली!

कुछ लोगों का कहना है कि कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियां देखकर लगता है कि ये खेल दो हज़ार दस में न होकर, मानो दस हज़ार दो में होने हों। ऐसा कहने वालों के संस्कृति-बोध पर मुझे तरस आता है। ये लोग शायद भारत की कार्य-संस्कृति से वाक़िफ नहीं हैं। मेरा मानना ह
 
नीरज बधवार
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अपने-अपने गौरव द्वीप!

बुक स्टॉल पर किताबें पलटते हुए अचानक मेरी नज़र एक मैगज़ीन पर पड़ती है। ऊपर लिखा है, ‘गीत-ग़ज़लों की सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’। ‘सर्वश्रेष्ठ त्रैमासिक पत्रिका’, ये बात मेरा ध्यान खींचती हैं। स्वमाल्यार्पण का ये अंदाज़ मुझे पसंद आता है। मैं सोचने लगता
 
नीरज बधवार
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स्वाइन फ्लू का विदेशी मूल!

पिछले कुछ सालों में अनजान कारणों से इस देश ने नकल को प्रतिभा प्रदर्शन का सबसे कारगर औज़ार मान लिया। विदेशी भाषा, रहन-सहन, खान-पान, सिनेमा हर मामले में यूरोप-अमेरिका की बखूबी नकल की। मगर क्या देख रहा हूं कि तमाम विदेशी मुद्राओं को जीवन के पर्दे पर हूबहू
 
नीरज बधवार
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असहनीय सम्मान!

अगर आप सम्मान के लायक हैं और सम्मान पाते रहते हैं तो कुछ वक़्त बाद इसकी लत पड़ जाती है। पैर, हर वक़्त छूए जाने के लिए फड़फड़ाते रहते हैं। हाथ, आशीर्वाद देने के लिए मचलते हैं। कान के पर्दे, तारीफ के बूटों से सजने के लिए बेकरार होते हैं। शहर से बाहर जाते
 
नीरज बधवार
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मशीनों की इंसानियत!

एक ज़माना था जब लोग मुझे पलट-पलट कर देखते थे और अब हालत ये है कि मैं खुद को अलट-पलट कर देखता हूं। गाल इतने फूल गए हैं कि आइने में सामने देखने पर कान नहीं दिखते और तोंद इतनी बढ़ गई है कि सीधे खड़े हो कर नीचे देखने पर पैर नज़र नहीं आते। डबल चिन कब की
 
नीरज बधवार
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दर्शन दो घनश्याम!

तस्वीरें, अंग्रेज़ी अख़बार का वो महत्वपूर्ण ‘कंटेंट’ हैं, जिनसे गुज़रते हुए हिंदीभाषी पाठक उसके पन्ने पलटता है। मैं भी यही कर रहा हूं। तस्वीरें देख रहा हूं और साढ़े तीन रूपए की बर्बादी की आत्मग्लानि के भंवर में फंसने से खुद को बचा रहा हूं। बहुत-सी सुंदर
 
नीरज बधवार
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मुसीबतों का इंद्रधनुष!

बारिश के बाद अगली सुबह है। मैं ऑफिस के लिए घर से निकला हूं। कुछ दूरी पर ही बर्बादी का ट्रेलर दिखने लगा है। नालियां ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। गटरों में हाई टाइड है। ये देख लोगों की हवा टाइट है। सड़क की हालत पर गश खा कुछ पेड़ सड़क पर ही गिरे पड़े
 
नीरज बधवार
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लिखना चिट्ठी इंद्र को और आना जवाब वहां से!

बारिश का इंतज़ार बीजेपी के झगड़ों की तरह लगातार बढ़ रहा था। मौसम विभाग की उल्टी-सीधी भविष्यवाणियां सुन, कान टपकने की हद तक पक चुके थे। बादल, मुंह दिखाई की रस्म निभा विदा ले रहे थे और सब्र का बांध, बजट पूर्व की उम्मीदों की तरह टूटने के कगार पर था। तभी
 
नीरज बधवार