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मेरी मौत के दिन

मेरी मौत के दिनतुम्हें हिचकियाँ नहीं आयेंगीं ,औरतुम्हारी आँखों से लावे की नदियाँ सूख गयी होंग़ीं -उस दिन मैं मुर्गियों की तरहदूकानों में बिक रहा होऊँगा ,मांस के टुकड़ों में , तोल तोल कर ,ग्लानि से भरा हुआ , धूप में कपड़ों के साथसूखता मिलूँगा -और मेरी घोर
 
Alok Shankar
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९१ कोजी होम

अब सब कुछ एक जैसा हो गया मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है मैं अपने आप से लड़ता हुआ यहाँ तक पहुंचा ......जब वो मेरे पास रहते हैं ,मैं निश्चिन्त हो कर जीता हूँ . एक बार उन्होंने मुझे अपने पास बुला कर कहा था ,इश्वर के भक्त हो ...इसीलिए मुझे तुम्हारी चिंता
 
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९१ कोजी होम

हम सभी सहायक ,गुलज़ार साहब की सिगरेट चुरा के पीते थे ।सभी सहायक गरीब ही थे ,और सब को सिगरेट पीने का शौक था ...डड़ू , राज सिप्पीको हम लोग बुलाते थे ....वही एक पैसे वाले थे ५५५ नाम की सिगरेट पीते थे ,बड़ीमुश्किल से एक सिगरेट देते थे ....महंगी जो होती थी ।
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब के बारे में कुछ लिखना ,कभी -कभी बड़ा मुश्किल हो जाता है ,उनके किस पहलु के बारे में लिखूं यही समझ में नहीं आ रहा है .....फिर भी ,अभी हाल में इक दिन कहने लगे .....तुम्हारे पिता जी ,मुझे सौंप के गये थे तुम्हे ,याद है की भूल गये ....... । मैंने
 
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९१ कोजी होम

आज मैं गुलज़ार साहब के उन सहयोगिओं के बारे में बात करूँगा ,जो उनका जैसा बनना चाहते थे....पर बन नहीं सके ....कपड़ों की नक़ल तो जरुर की .....मैं गुलज़ार साहब की पहली फिल्म "मेरे अपने "से बात करूंगा .......गुलज़ार साहब ......के सहायक जो उनकी पहली फिल्म ...मेरे
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , मुझे बूढ़े सन७३ में भी लगते थे । क्यों ? मुझे नहीं मालूमवक्त बीतता गया आज भी वैसे ही हैं ,वजह ....मुझे नहीं मालूम । जैसे बचपनेसे सीधे बुढ़ापे में आ गये , वैसे भी ,उन्हें बुढ़ापे से ज्यादा प्यार है ,आप को उनकीफिल्मों से ही पता चल जाएगा ,उनका
 
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९१ कोजी होम

पीछे मुड के देखने की आदत नहीं है ,गुलज़ार साहब की । आज तक ,हजारो लोग मिले उनसे ,बहुत करीब से दोस्त भी हुए ....फिर किसी मोड़ पे ,छोड़ के चले गये .....जो उनके साथ चले ,वह बहुत कम लोग हैं ।उनके दोस्तों में ,एक राही साहब थे ,गुज़र गये कुछ साल पहले । शाम होते
 
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गुलज़ार साहब के बहुत सारे पहलु के बारेमें बात किया मैंने अभी तक , मेरी इच्छा थी ,....आप लोग उनके किसी पहलु से अवगत होनाचाहते हैं तो , मैं कोशिश करूंगा .बताने का । ... आज मैं ,उनके अकेलेपन के बारे में बात करूँगा । गुलज़ार साहब ,अकेले रहते -रहते ...अकेले पन
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब को गुस्सा क्यों आता है ? गुस्सा तो हर किसी को आता है ,पर गुलज़ार साहब झूठ बोलने पे गुस्साकरते हैं । झूठ बोल के भी कभी झूठ मत बोलना उनके सामने , वरना वह हो जाएगा जोकभी नहीं हुआ । आप घबरा गये होंगे ....सिर्फ आप से बात करना कम कर देंगे ... किताब
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , जिद्द भी कमाल की करते हैं जैसा वह सोचते हैं वैसा ही होना चहिये ,गाने की लाइन अगर लिख दीउसको आप तोड़ मडोड़ नहीं सकते और कोशिश, भूल कर मत कीजयेगा ....काम छोड़ देगें पर लाईन नहीं बदलेंगे ,कई बार होता है ऐसा ,एकदो शायरी कीकिताबे लोग पढ़ के
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब की मेहमान -नवाजी ...... .......बहुत अच्छे ढंग से करते हैं ,हिन्दू धर्म में कहा गया है ....भगवान् कास्वारूप होते हैं , मेहमान । जो भी उनसे मिलने आता है ,उसके खाने -पीने का खुद ही ख्याल रखतेहैं । और अच्छी से अच्छी चीज खिलाने की कोशिश करते हैं ।
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब का दर्द ...................................... उनका दर्द , अपनी डायरी तक रहता है ......कभी किसी से कहते नहीं .....और जब निकला भी तो सब तक पहुंचा ........ हजार रहें , मुड़ के देखी कहीं से कोई सदा न आई बड़ी वफा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब का दर्द ..........किसी से नहीं बाँटते ....उनकी शायरी में बहता हुआ ,नज़र आयेगा ...उसी दर्द को एक खूबसूरत सी माला जरुर बना देते हैं .... जैसे .......हजार राहें ,मुड के देखीं कहीं से कोई सदा न आई बड़ी वफा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब को घूमने का बहुत शौक है और वह भी अकेले ,निकल जाते हैं किसी वोरआज तक यह आदत कायम है ....महीने में पांच दिन तो बाहर ही रहते हैं ...पर रहते हैं वहीं जहाँवो चाहते हैं ....एक बार की बात है .....गुलज़ार साहब को दिल्ली जाना था ...मिर्ज़ा ग़ालिब
 
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९१ कोजी होम

वक्त के बहुत पाबंद हैं गुलज़ार साहब ,अगर आप उनसे मिलने जारहें हैं तो ,एक बात ख्यालरखना पड़ेगा ,जो वक्त कुटी साहब ने दिया है उससे पांच मिनट पहले पहुंचना पड़ेगा ...वरनाआप की मीटिंग कैंसिल हो जायेगी .......आज भी मैं वगैर वक्त लिए उनसे मिलने नहीं जाता आज भी
 
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९१ कोजी होम

हमारे शास्त्रों में कहा गया है , हर मनुष्य को सिर्फ एक वक्त का भोजन करना चाहिए ....गुलज़ार साहब एक ही वक्त भोजन करते हैं ......जब मैं उनके पास वतौर सहायक लगातो पता चला ....सुबह एक गिलास दूध पीतेहैं ........फिर शाम को खाना खाते हैं ,वह भीदो फुल्के थोड़ी सी
 
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९१ कोजी होम

भाई के बारे में जितना लिखो उतना ही कम लगता है .....हम सभी सहायक उनको भाई कहके बुलाते है । आज भी हम गुलज़ार साहब को भाई कहते है .....आप जब भी गुलज़ार साहब से मिलेंगेआप उन्हें हमेशा जागा हुआ पायेंगे ....आप को बहुत ध्यान से सुनेगें ......पर आप को यह पता
 
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९१ कोजी होम

सन ८० का दौर था । गुलज़ार साहब , के साथ जब भी बाहर जाता ....लोग उन्हें इस तरह देखतेजैसे कोई हीरो हो .....मुझे समझ नहीं आता ....इतने नामचीन कैसे हैं ? एक तो उनके सफेद कपड़ोंसे पहचान थी ...हमेशा सफेद कुर्ता और सफेद पैंट और उस पर सुनहले रंग की मोजडी । सच
 
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९१ कोजी होम

मैं सन ७३ से ले कर सन ९९ तक उनके साथ सहायक रहा ....जिस भी घटना का जिक्र करता हूँवह इसी दौर की हैं ....वैसे आज भी हमारा मिलना जुलना पहले जैसा ही है ....आज तक मुझे उनमेंकोई भी अवगुन नजर नहीं आया .....कोई भी उनके बारे में बुरा बोलता है तो ...उसकी अपनी
 
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९१ कोजी होम

बात सन ७७ की है , उस वक्त मेराज साहब गुलज़ार साहब के मुख्य सहायक थे । एक निर्माता गुलज़ार साहब को साईन करने आया ,अपनी अगली फिल्म के लिए वतौर लेखक और निर्देशक । निर्माता का नाम तो याद नहीं आ रहा है ....कुछ देर बाद मेराज साहब को गुलज़ार साहब ने अपने कमरे में
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , जो लोग खाने की थाली में अन्न छोड़ते हैं उन लोगों से बहुत खफा होते हैं ।बहुत साल पहले की बात है ...कभी -कधार हम सभी सहायक एक साथ गुलज़ार साहब केसाथ बैठ कर खाना खाते थे ....मेराज साहब की एक आदत थी, जल्दी -जल्दी खाना खा कर उठ जाते थेऔर प्लेट में
 
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९१ कोजी होम

नया साल आये तीन दिन बीत चुके हैं .......कुछ नहीं लिखा ....तीन दिन यह सोचते बीत गया.........मैंने क्या किया इस साल ......लगा कुछ नहीं किया ...कुछ भी ऐसा नहीं जिसे याद किया जा सके ...यादों को जो लिख रहा हूँ .....जो मैंने देखा -सुना ,इसमें कुछ भी लाट-लपेट
 
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९१ कोजी होम

एक शाम ,मैं किसी काम से गुलज़ार साहब से मिलने उनके बंगले में मिलने गया था .....मेरे पास मोटर साईकिल थी ,जो बड़े बेटे की थी ....मैं अब नहीं चलाता था ...फिर भी उसी से गया था .....वजह थी नई ....अभी कुछ महीने पहले उसने खरीदा था .....होंडा की करिज्मा थी
 
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९१ कोजी होम

किताब फ़िल्म ,करीब तीन महीनों में पूरी हो गई ,रिलीज़ भी हुई । पर फ़िल्म उतनी नहीं चली ,जिसकी वजह से गुलज़ार साहब को काफी नुकशान उठाना पडा .........फ़िर इसके बाद से गुलज़ार साहब फ़िल्म निर्माण का काम बंद कर दिया .........बहुत दिनों तक हम सभी सहायक बेकार
 
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९१ कोजी होम

किनारा फ़िल्म पूरी हुई ,और रिलीज किया गया ,पर जितना सोचा गया था उतनी फ़िल्म नहीं चली ,फ़िल्म में घाटा हुआ इस घाटे को पूरा करने के लिए ,एक छोटी सी फ़िल्म बनानी थी और फ़िल्म शुरू हुई किताब ..........यह एक बच्चे की कहानी थी ,जो शहर में अपने जीजा जी और द
 
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