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इतिहास की दृष्टि से वर्ण व्यवस्था -भाग ३ (अन्तिम भाग)

"...This hasty survey of historical development of caste sufficiently disposes of the popular theory that caste is permanent institution, transmitted unchanged from dawn of Hindu history and myth"विलियम क्रूक, "दा ट्राइब्स एंड कॉस्ट ऑफ़ दा नॉर्थ वेस्टर्न
 
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इतिहास की दृष्टि से वर्ण व्यवस्था -भाग २

न वर्णा न वर्णाश्रमाचारधर्मा न मे धारणाध्यानयोगादयोपि।अनात्माश्रयाहंममाध्यासहानात्‌ तदेकोऽवशिष्ट: शिवः केवलोऽहम्‌॥जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित "दशाश्लोकी" के यह श्लोक७वी शताब्दी में वर्ण-व्यवस्था की धार्मिक मीमांसा और दर्शन में नगण्यता को दिखता है।
 
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इतिहास की दृष्टि से वर्ण व्यवस्था -भाग १

ब्राह्मण क्षत्रिय विशाम् शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:॥ (गीता १८/४१)अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र कर्म स्वभाव से हीउत्पन्न गुणों के आधार पर ही विभाजित किए गए हैं।अरविन्द शर्मा की "क्लास्सिकल हिंदू थोअट" में वर्ण
 
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कर्ण और वर्ण व्यवस्था

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक, सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर।तन से
 
Sudhir (सुधीर)