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आभार: जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||

निज कबित्त केहि लाग न नीका | सरस होउ अथवा अति फीका ||जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||जग बहु नर सर सरि सम भाई | जे निज बाढी बढ़हिं जल पाई ||सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई | देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ||तुलसीदास, रामचरित मानस बालकांड रसीली हो
 
Sudhir (सुधीर)
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दैनिक हिन्दुस्तान के रविश जी को एक खुला पत्र.

आदरणीय रविश जी, सहर्ष अभिनन्दन। सर्वप्रथम मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहूँगा - मेरे इस प्रयास का संज्ञान लेने और इसके सम्बन्ध में अपने विचारों का प्रकाशन के लिए। आपके विचार, यूँ तो १३ मई २००९ के दैनिक हिन्दुस्तान संस्करण में प्रकाशित हुए किंतु उसके वि
 
Sudhir (सुधीर)
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