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आसमान के पेशेवर होने से बस थोड़ा सा पहले…

लोकेशन – कोयमबटूर… साल २००७ के जुलाई महीने का पहला हफ़्ता… दो महीने चली एक रिगरस ट्रेनिंग के बाद आने वाले ४-५ दिनों में हमें अपनी अपनी ब्रांच लोकेशन्स में रिपोर्ट करना था… फ़ोटो खिंचाई अभियान जोरों शोरों पर था और स्लैम बुक भरवाई कार्यक्रम भी… दो
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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तशनगी

रात भर बेबसी सी होती है , सुबह फ़िर तशनगी सी होती है।फ़ूलों में खुशबू अब नहीं होते ,धूप मे भी नमी सी होती है।अपनी खुशियां सुकूं नहीं देती , तेरे ग़म से खुशी सी होती है ।मैं शराबी नहीं मगर तुझको , देखकर मयकशी सी होती है ।मुल्क में बहरों की सियासत है ,हर सदा
 
ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι
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वो लोग जो पहाड़ हैं…

वो हमारी कम्पनी का फ़ेस है… कम्पनी का मेन गेट खोलिये और दीवार पर लगे कम्पनी के एक बड़े लोगो(Logo) के साथ साथ, कानों में हेडसेट लगाये हुये उसकी मुस्कुराहट आपका स्वागत करती है। हमारी कम्पनी की सारी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स भी बिना उसकी इजाजत के कहीं कनेक्ट
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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धन फॉर रन एंड रन फॉर फ़न

—चौं रे चम्पू! का हाल ऐं रे तेरे?—फिट, एकदम फिट हैं चचा।—चौं रे, जे फिट की परिभासा का ऐ? कोई आदमी फिट कैसै मानौ जायगौ?—अगर उसकी जरूरतें पूरी हो रही हैं, वह मस्त है, तो फिट है।—जरूरत का ऐं इंसान की? वोई रोटी, कपड़ा और मकान।?—लेकिन पूछिए कि रोटी को किस चीज़
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सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं...........

सोचती हूँ तुमसे किनारा कर लूं..........क्यूँ इतना आश्चर्य क्यूँ...........चलो तुम्हारा आश्चर्य करना कुछ तो वाजिब है। वैसे भी तुम मेरे साथ थे ही कब??? जब साथ ही नहीं तो मुझे जाना ही कहाँ?? तुमको शायद याद भी न हो पर मेरे जेहन में तो वो पल आज भी वहीँ का
 
Shikha Deepak
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थोड़ी गोसिप…

- हेलो  सर! मैं ___ बोल  रही  हूँ ___ बैंक से  - हम्म… - सर, आपको  पर्सनल  लोन  की  रिक्वायरमेंट है?  - नहीं।  - सर , कोई  रेफेरेंस ? (रेफेरेंस?? मैं  जानता  ही  किसे  हूँ… 
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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देख तमाशा नकली का

अब तक सब ने देखा होगा खेल तमाशा ढपली का. गाँधी के  भारत में देखो लोग तमाशा नकली का.बच्चे को जो दूध पिलाया वो मिला यूरिया नकली था,कंप्यूटर का पार्ट खरीदा वो भी साला नकली था,होली पर जो मावा लाया वो सपरेटा नकली था,खाकर जब खटिया पे 
 
Sachin Rathore
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कल और आज !

छत कि मुंडेर पर बैठीनीचे लगे वृक्षों को  देखकर ठंडक काअहसास ले रही थी.फिर नजर पड़ी शाखों के बीच घोंसले में बैठेपक्षियों के नवजात शिशु बंद आँखों से माँ की बाट जोह रहे थे.कब आएगी औ'कब डालेगी दाना मुंह मेंफिर अपने पंखों तलेछिपा कर
 
रेखा श्रीवास्तव
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सबसे बडा टिकट..

कहते है एक तस्वीर कई हज़ार शब्दो के बराबर होती है… :)     बहुत खुश हू और बहुत एक्साईटेड भी… दिमाग मे तरह तरह के विचार भी आ रहे है.. जैसे बैनर पर क्या लिखू.. क्या पहनकर जाऊ.. इत्यादि… इत्यादि… :)   वैसे काफ़ी तमन्नाये ऐसी भी है जिनका पूरा
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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ख्वाहिशो की स्टेटस रिपोर्ट

आसमान तब भी उतना ही बड़ा था… बारिशें तब भी पूरा ही भिगोतीं थीं… वो पानी के बताशे तब भी लार गिरवाते थे… और वो आइसक्रीम तो उफ़्फ़… अस्थमा मरीज होने के कारण ठंडी चीज़ें खाना मना था… मतलब घर वालो के सामने खाना मना था… बाहर तो बस कुल्फियों के दौर चलते थे… तबियत
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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कितनी अजीब शै ..........जिन्दगी

बिछड़ चला है तो मेरी दुआएं लेता जावहाँ वहाँ मुझे पाए जहाँ जहाँ जाए !!!कुछ लोग चंद लाइनों में कितना कुछ कह देते हैं। पुरानी डायरी के पन्ने पलट रही थी तो कहीं बीच में यह लाइनें लिखी हुई दिखीं.........किसने कही, कब कही और कहाँ कही यह तो पता नहीं पर पढ़ कर
 
Shikha Deepak
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चंद मुलाकातों की है दिल कि कहानी!!

कई  बार  यूँ  भी  होता  है  कि  ज़िन्दगी  कि  राह  पर  चंद  मुस्कुराहटें  पड़ी  मिल  जाती  हैं... कुछ  कुछ  उस  ५ रूपये के  सिक्के  कि  तरह 
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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कॉलेज के दिन…….याद आएँगे……

आज कॉलेज का अंतिम दिन था । कुछ दिनों में फाईनल परिक्षायें होंगी, उसके बाद हम सभी छात्र अपना बोरिया- बिस्तर बाँध यहाँ से निकल पड़ेगे । चार साल किस तरह बीत गये, कुछ पता हीं नहीं चला । मन दुःखी इसलिये है कि हम सभी दोस्त एक दूसरे से बिछड़ जायेंगे और ना जाने
 
चंदन कुमार झा
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वो कायर है......

उसकी  एक  पर्सनल   डायरी  के  इंट्रो  में  लिखा  है  - 'मैं  कायर  हूँ'.. उसने  ये  सच  गाँधी  जी  की  आटोबायोग्राफी  से  प्रभावित  होकर 
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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कुछ एं वें ही..

                      Dumb Charades तुमने वो सब कुछ, जो अपनी आँखों से बोला था, ज़िन्दगी आजतलक हमे उनके मायने समझाती है॥   Rebellion मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था, माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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शुक्रिया ......ऐ दोस्त !!!!!!

करीब दस महीनों के बाद आज अपने ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँ। इतने दिनों न लिखने के बहुत ढेर सारे कारण हैं, उनको फिर कभी बताउंगी पर अभी बताती हूँ कि मैं क्यों फिर लिख पा रही हूँ...............इतने दिनों लिखा तो नहीं पर बहुत कुछ पढ़ा और बहुतों को पढ़ा। उस बहुत
 
Shikha Deepak
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एक स्तब्ध पेड़

दीदी “समता” की एक रचना-   पतझड़ सी भंगिमा लिये एक स्तब्ध पेड़ । उसकी निस्तब्धता विच्छिन्न क्यों ? शायद देखता है, अपने साथियों को, सावन आने की खुशी में, खिलते हुऐ , हरियाली दिखाते हुऐ । मगर वह क्यों वंचित है, इन खुशियों से ? प्रकृति नहीं जानता, भेद भाव
 
चंदन कुमार झा
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स्टेचू….

याद है, तुमने जब मुझे भरी रोड पर ’स्टेचू’ बोला था, वो लम्हा फ़्रीज़ हो गया था, सिर्फ़ तुम्हारे एक ’पास’ के इन्तजार मे..... आज जब ज़िन्दगी भागती है, हर एक लम्हे पर पाव रखकर.... मै मजबूर लम्हो के बीच, खडा सोचता हू, कि तुम आओ और ’स्टेचू’ बोल दो.... और इस बार
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पिछ्ले पन्नो से कुछ - रेत पे नाम!!

सुना है यादें संजोकर रखी जाती हैं इस गतिमान पर स्थिर ह्रदय में..... मेरी भी कुछ यादें उससे जुड़ी हुई हैं। न जाने हम कब तक समंदर के किनारे बैठे रहते थे, हर एक लहर को अपने पास आते और थोड़ा सा भिगोकर जाते हम साथ बैठे देखा करते। वो रेत पे मेरा नाम लिखती और
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स्वप्न!!

तुम्हे क्या कहूं ख़ुद ही बताओ, अपने नैनो की भाषा हमें भी समझाओ, शायर की ग़ज़ल कहूं या कहूं 'पंकज' की कविता, आंखों को तेरी कमल कहूं या सूर्योदय मैं सविता । झील सी इन आंखों को हल्के हल्के, उठाने के बाद जैसे ही देखती हो, हल्का सा मुस्कुराकर , जब कुछ कहती हो
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बुलबुला

बरसात हो रही है.........जमीन पर पड़ती बूँदें.........बनते बिगड़ते बुलबुले.........इन्ही बुलबुलों सी ही तो है जिन्दगी.......एक पल बनती अगले ही पल बिगड़ती पर इन दो पलों के बीच एक पूरी जिंदगी। कश्मकश.......होड़......आपाधापी......संघर्ष.......औपचारिकता, यही
 
Shikha Deepak
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And they lived happily ever after!

शादी क्या सब कर सकते हैं? अब ये भी कोई सवाल है? मुझे लगता है कि है। आज तुम्हे कविता लिखना अच्छा लगता है। कितनी ही बार तुम रातों को उठे और नींद मे तली, हाथों से छानी नज़्मों को तुमने डायरी पर परोस दिया। और कितनी बार तुमने पहाड़ों से बात करनी चाही और जब
 
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ऐसा क्यों होता है ?

कम नहीं था वह प्रेम जो दिया मैंने तुमको । माना कि तुम्हारी कुछ मजबूरियाँ थी । पर चाहती थी मैं भी सबकुछ बांटना तुम्हारा दुःख- सुख और तुम्हारा द्वन्द । मानते हो  न तुम कि अधिकार था यह मेरा । पर तुम्हारा अहम और तुम्हारी मजबूरी । तुम्हारी मजबूरियों
 
चंदन कुमार झा
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चार दिन की ज़िन्दगी...

ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारों चार दिन भी खुदा को पा गया वाईज़, मगर है जरुरत आदमी को आदमी की मिला हूं मुस्कुरा कर उस से हर बार मगर आंखों में भी थी कुछ नमी सी मोहब्बत में कहें क्या हाल दिल का खुशी ही काम आती है ना गम ही भरी महफ़िल
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गर तुम्हारी कमी नहीं होती

शायिरा: शिबली हसन 'शैल'गर तुम्हारी कमी नहीं होतीबेवफ़ा ज़िन्दगी नहीं होतीहर कोई क्यों फ़रेब देता हैज़िन्दगी क्यों मेरी नहीं होतीबेच देती ज़मीर गर अपनाघर में कुछ कमी नहीं होतीबेवफ़ा है वो जानती हूँ मैंप्यार में कुछ कमी नहीं होतीदिल जलाकर भी 'शैल' देखा हैघर में
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कहानी..........बीज

उसका जन्म हो चुका था..........पर वो संसार के लिया अदृश्य था...........वो जीवन के अन्य रूप की परतों के भीतर छुपा था..........वो एक बीज था। एक विशाल वृक्ष के ढेरों फलों में से एक के भीतर छुपा..........जीवन का आरंभ..........एक बीज। सब कुछ अनोखा था उसके लिए,
 
Shikha Deepak
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कहानी........औरत

यह कहानी एक औरत की है............औरत............एक ऐसी औरत जो सभी घटनाओं का केन्द्र थी फ़िर भी उसका महत्त्व किसी ने नहीं समझा और जब समझा तब बहुत देर हो चुकी थी। वो औरत................एक व्यापारी के घर पैदा हुई...........कन्या रत्न की प्राप्ति घाटे में
 
Shikha Deepak
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ट्रैफिक सिग्नल पर.........

अभी दो दिन पहले अपनी एक मित्र के साथ किसी काम से घर के पास ही एक बाजार गयी थी। जाते समय हमने देखा कि कुछ औरतें अपने बच्चों के साथ सड़क के किनारे बैठ कर खाने के डब्बे निकाल कर अपने बच्चों को खिला रही हैं और बीच बीच में ख़ुद भी खा रही हैं। माएं अपने बच्चों
 
Shikha Deepak
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घर से मेरे हर ख़ुशी निकली

घर से मेरे हर ख़ुशी निकलीज़िन्दगी तुझसे दुश्मनी निकलीदफ़अतन याद आ गया कोईमेरी आँखों में फिर नमी निकलीमैंने दामन पकड़ लिया उसकाग़म के साये में फिर ख़ुशी निकलीदोस्तों के उतर गये चेहरेमेरे होंटों से जब हँसी निकलीमुद्दतों बाद उसको भूली हूँदिल से यादों की पालकी