मेरा सफ़र
रात उम्मीद से भारी है , सुबह होने नहीं वाली है।मुश्किलों से भरा है सफ़र ,आज ज़ख्मों की दीवाली है।मैं चरागों का दरबान हूं , वो हवाओं की घरवाली है।क़ातिलों को ज़मानत मिली , न्याय मक़तूल ने पा ली है।मै खुदा को कहां ढूढूं अब , मन्दिरों मे भी मक्कारी है।सुख समन्दर
Jun 10 2010 06:44 AM



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