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पिया संग खेलब होरी...

सखि ऊ दिन अब कब अइहैं,पिया संग खेलब होरी ।बिसरत नाहिं सखी मन बसियाकेसर घोरि कमोरी ।हेरि हिये मारी पिचकारीमली कपोलन रोरी ।पीत मुख अरुन भयो री -पिया संग खेलब होरी । अलक लाल भइ पलक लाल भइतन-मन लाल भयो री ।चुनरी सेज सबै अरु नारीलाल ही लाल छयौ री ।आन कोउ रंग
 
हिमांशु । Himanshu
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फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..

’आचारज जी’ का आह्वान सुन लपके ही थे कि तिमिरान्ध हो गये (यूँ फगुनान्ध होने को बुलाये गये थे ) । बिजली फिर ब्रॉडबैण्ड - दोनों ही रूठ गये । उस वक्त जो लिखा था, पोस्ट नहीं कर पाया । अभी कर रहा हूँ, कारण खुद को जोड़ने की क़वायद है महोत्सव से -(१)ठौर-ठौर
 
हिमांशु । Himanshu
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