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गौरव सोलंकी की कविता, ''मैं बिक गया हूँ''

एक वर्ष पहले अपने ब्‍लॉग शब्‍दों की दुनिया पर  गौरव सोलंकी की एक कविता पोस्‍ट की थी, कविता इस ब्‍लॉग के मिजाज के अनुकूल है, इसलिए दोबारा यहां पेश कर रहा हूं...कुछ लोगों ने इस कविता को गौरव की निराशा बताया तो, किसी ने इस पर कविता के मानदंडो पर खरा