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हिन्दू आध्यामिक दर्शन-भक्ति के विभिन्न स्वरूप मान्य (hindu adhyamik sandesh-bhakti ke alag laga roop)

विरोधः कर्मणीति चैन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्।।हिन्दी में भावार्थ-यदि देवताओं की पूजा, यज्ञादि कर्म में विरोध आता है तो उसे ठीक नहीं मान लेना चाहिये क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय में अनेक रूप धारण करना संभव है-ऐसा देखा गया है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय
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श्रीमद्भागवत गीता एक स्वर्णिम ग्रंथ है-रविवारीय चिंतन (shri madbhagvat geeta a golden book)

अपना अपना विचार है और उसके अभिव्यक्त होने की भी अलग अलग शैली होती है। इसलिये किसी के कुछ लिखने और पढ़ने पर उस आदमी के आंतरिक मनस्थिति की भी जानकारी मिल जाती है। इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पढ़ते कम हैं लिखने और कहने के लिये लालायित अधिक रहते
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रहीम सन्देश-पानी के बिना मनुष्य, मोती और अनाज का अभ्युदय नहीं हो सकता

कविवर रहीम कहते हैं कि--------------------------------रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सूनपानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून आशय यह है  पानी को बचा कर रखें क्योंकि पानी बिना सब सून। पानी अगर न रहा तो मोती, मनुष्य और अनाज किसी का उद्धार नहीं हो
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हिंदू धर्मं सन्देश-विषैले पदार्थ और विषयों से दूर रहना श्रेयस्कर

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार---------------------------नित्यं जीवस्य च ग्लानिर्जायते विषदर्शनात्।एषामन्यतमेनापि समश्नीयत्परीक्षितम्।हिन्दी में भावार्थ-प्रतिदिन विष को देखने से ही मन में ग्लानि हो जाती है इसलिये किसीके  सहयोग से भोजन की परीक्षा
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मनु स्मृति-दिल में बैठे देवता की अनदेखी न करें (dil ka devata-hindu dharma sandesh)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।हिन्दी में भावार्थ-झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में
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संत कबीरदास के दोहे-स्वयं ठग जायें, पर दूसरे को न ठगे(sant kabir das ke dohe-khud kisi ko na thagen)

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोयआप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होयसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आपको कोई ठग जाता है तो कोई बात नहीं है, पर आप स्वयं किसी को ठगने का प्रयास मत करो। हम ठग जायें तो एक तरह से इस बात का तो सुख होता है कि हमने स्वयं कोई
 
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भर्तृहरि नीति शतक-राजाओं को कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है

दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयंतु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः। जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदंसखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी
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संत कबीर के दोहे-कपटी कभी साधु नहीं बनते (kapti kabhi sadhu nahin hote-kabir ke dohe)

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंसते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो
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रहीम संदेश-सुख दुःख तो चौसर की गोट की तरह हैं (rahim ke dohe-sukh dukh)

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोटरहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोटकविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चौसर  की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।वर्तमान संदर्भ में
 
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संत कबीर दास के दोहे-गुरु के लिए अधिक संपत्ति जोड़ना खतरनाक (kabir ke dohe-sant aur sanpatti)

माया दासी संत की साकट की शिर ताजसाकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता
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रहीम संदेश-सूख तालाब पर जाने से लाभ नहीं (sukhe talab se labh nahin-rahim sandesh

तेहि प्रमाण चलिबो भलो, जो सब दिन ठहराइ। उमड़ि चलै जल पार तें, जो रहीम बढ़ि जाइ।। कविवर रहीम का कहना है कि जिससे सब दिन आनंद प्राप्त हो वही सुख प्रमाणिक माना जाना चाहिये।  ऐसे सुख से क्या लाभ जो क्षणिक हो और वह ऐसे ही उतर जाये जैसे बाढ़ का पानी। तासो ही
 
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पतंजलि योग दर्शन-जातीय सीमाओं से मुक्त होने पर मनुष्य बन जाता है महावत (patanjali yog darshan-manushya aur jatipati)

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।हिन्दी में भावार्थ-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण
 
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रहीम के दोहे-कमाने के लिये दूसरे के घर में सिर झुकाना बुरा लगता है (kamane ke vaste desh se bahar jana-rahim ke dohe)

भला भयो घर से छुट्यो, हंस्यो सीस परिखेतकाके काके नवत हम, अपन पेट के हेत कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।वर्तमान
 
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रहीम संदेश-समय कभी एक जैसा नहीं रहता (samay ms saman nahit rahta-rahim ke dohe)

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जायसदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछितायकविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं
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संत कबीर दर्शन-जैसे पदार्थ भक्षण करते हैं वैसे ही विचार हो जाते हैं

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होयजैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होयसंत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-भंवरा मरने के लिये ही हाथी के कान में ध्वनि करता है (hathi aur bhavra-kautilya darshan)

स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिोचनः।मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।हिन्दी में भावार्थ-दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है। गन्धलुब्धो मधुकरो
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पतंजलि योग दर्शन-संयम से होते हैं अनेक लाभ (patanjali yog darshan-sanyam se labh)

शब्दार्थप्रत्ययानामितोसराध्यासात् संक्रस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्हिन्दी में भावार्थ-शब्द, अर्थ और ज्ञान का निरंतर अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण होता है। उसके विभाग में संयम करने संपूर्ण प्राणियों के वाणी का ज्ञान हो जाता
 
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मनुस्मृति-जिस से मानसिक तनाव हो, वह काम न करें (mansik tanan n palen-manu smruti

यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यलेन वर्जयेत्।यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः।हिन्दी में भावार्थ-जिस काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है उनका त्याग कर देना चाहिये तथा अपने हाथ से ही संपन्न होने वाले अनुष्ठान करना चाहिए। यत्कर्मकुर्वतोऽस्य
 
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श्रीगुरुग्रंथ साहिब-झगड़ा करने से झगड़ा ही मिलता है (shri gurugrantha sahib-Jhagada n karen)

कलह बुरी संसारि।’हिन्दी में भावार्थ-संसार में कलह बुरी चीज है।‘झगरु कीए झगरउ पावा।‘हिन्दी में भावार्थ-झगड़ा करने से झगड़ा ही हासिल होता है।‘उना पासि दुआसि न भिटीअै जिन अंतरि क्रोधु चंडालु।’हिन्दी में भावार्थ-जिन मनुष्यों के हृदय में क्रोध रूपी चंडाल रहता
 
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विदुर नीति-मित्र का पहले से परिचित या संबंधी होना जरूरी नहीं (hindu dharma sandesh-religion of friendship)

सत्कृतताश्च श्रुतार्थाश्च मित्राणं न भविन्त ये।तान् मुतानपि क्रव्यादाः कृतध्नान्नोपर्भुजते।।हिन्दी में भावार्थ-जो अपने मित्र से सम्मान और सहायता पाने के बाद भी उनके नहीे होते ऐसे कृतघ्न मनुष्य के मरने पर उनका मांस तो मांस खाने वाले जंतु भी नहीं खाते। न
 
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मनुस्मृति-जुआ और सट्टा राष्ट्र में डकैती के समान (juaa aur satta desh ke liye bura-manu smruti)

प्रकाशमेतत्तास्कर्य यद्देवनसुराहृयौ।तयोर्नित्यं प्रतीवाते नृपतिर्यत्नवान्भवेत्।।हिन्दी में भावार्थ-द्युत और समाहृय (जुआ और सट्टा)दिनदहाड़े डकैती के समान माने जाने चाहिए। यह देवता और असुर दोनों का विनाश कर देते हैं। अतः राज्य को इन पर रोक लगाने का प्रयास
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पतंजलि योग दर्शन-राग, द्वेष तथा भय का भाव स्वाभाविक (patanjli yog darshan-raag dwesh aur bhay ka bhav)

सुखानुशयी रागः।।हिन्दी में भावार्थ-सुख के भाव के पीछे राग है।दुःखानुशयी द्वेषः।।हिन्दी में भावार्थ-दुःख के भाव के पीछे रहने वाला भाव क्लेश है।स्वरसवाह विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः।।हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य स्वभाव में भय का भाव परंपरा से चला आ रहा है जिसे
 
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पतंजलि योग दर्शन-क्लेशों से मुक्ति दिलाती है समाधि (patanjali yog darshan-samadhi)

तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रिया योग।।हिन्दी में भावार्थ-तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर की शरण लेना-ये तीनों क्रियायोग हैं।समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।हिन्दी में भावार्थ-जब समाधि में सिद्धि प्राप्त हो जाती है तब अज्ञान तथा क्लेश का नाश होता है।वर्तमान
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-संकटों से सामना करने का उपाय करें (apne sankatmochak swyan bane--kautilya arthshastra)

हुताश्नो जलं व्याधिर्दुभिक्षो मरकस्तया।इति पंवविंधं दैव व्यसनं मानुषं परम्।।हिन्दी में भावार्थ-अग्नि, जल, व्याधि,अकाल तथा मौत यह पांच तो भाग्य से निर्मित होकर मनुष्य को पीडा़ देते हैं पर व्यसन करना उसका निजी दोष है।दैवं पुरुष्कारेण शान्तया चं
 
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कबीर के दोहे-दुष्टों कि निंदा कि बजाय साधुओं के प्रशंसा में वक्त बिताएं (kabir ke dohe-ninda aur prashansa)

काहू को नहिं निन्दिये, चाहै जैसा होय।फिर फिर ताको बन्दिये, साधु लच्छ है सोय।।संत कबीरदास का कहना है कि चाहे व्यक्ति अच्छा हो या बुरा उसकी निंदा न करिये। इसमें समय नष्ट करने की बजाय उस आदमी की बार बार प्रशंसा करिये जिसके लक्षण साधुओं की तरह हों।सातो सागर
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मनुस्मृति-धर्म की हत्या करने वाले का नाश होता है

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नोधर्मोहतोऽवधीत्।।हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य धर्म की हत्या करता है, धर्म उसका नाश करता है। इसलिये धर्म की रक्षा करना चाहिए ताकि हमारी रक्षा हो सके। यद्राष्टं शूद्रभूयिष्ठं
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मनु स्मृति-अपने ऊपर निर्भर काम को ही हाथ में लें (apna hath jagnnath-manu smriti)

यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।हिन्दी में भावार्थ-जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए। सर्वे परवशं दुःखं
 
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संत कबीर दर्शन-गुरु भक्ति के बिना राजा भी गधा (Guru Bhakti ke bina-kabir ke dohe)

तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं। कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।माटी लदै कुम्हार की,
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भर्तृहरि शतक-जब तक काम का हमला न हो तभी तक रहती है सज्जनता (sex and religion-hindi sandesh)

संसार! तव पर्यन्तपदवी न दवीयसी।अन्तरा दुस्तराः न स्युर्यदि ते मदिरेक्षणा।।हिन्दी में भावार्थ-यहां भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि ‘ओ संसार, तुझे पार पाना कोई कठिन काम नहीं था अगर मदिरा से भरी आखों में न देखा होता। तावन्महत्तवं पाण्डितयं केलीनत्वं
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मनुस्मृति-‘बक वृत्ति’ के लोगों की पहचान (manu dharma sandesh in hindi)

अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतवरो द्विजः।।हिन्दी में भावार्थ-असत्य बोलने, कठोर वाणी में वार्तालाप करने तथा दूसरे के धन पर बुरी नज़र रखने वाले को बक वृत्ति का माना जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने कल्याण की बात भी नहीं समझता और
 
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मनुस्मृति-क्रोध आने पर भी डंडा न उठायें (manu smriti-krodh par kabu rakhen)

परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।हिन्दी में भावार्थ-कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।
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संत कबीर वाणी-परखने के बाद किसी से संपर्क बढ़ायें (sant kabir vani-manushya ko parkhen)

कबीर देखी परखि ले, परिख के मुखा बुलाय।जैसी अंतर होयगी, मुख निकसेगी आय।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति मिले तो पहले उसे परखो फिर उसके मुंह से कुछ बुलवाओ। जैसी बात उसके अंदर होगी वैसी ही बाहर निकल आयेगी।पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै
 
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मनुस्मृति-वेदों की निंदा न करें (ved ninda n karen-manu smruti in hindi)

नास्तिक्यं वेदनिंदा च देवतानां च कुत्सनम्।द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत्।हिन्दी में भावार्थ-भगवान के अस्तित्व पर अविश्वास, वेदों की निंदा, देवताओं का अपमान, अन्य लोगों से शत्रुता तथा विरोध रखना, पाखंड, अहंकार, क्रोध तथा स्वभाव में
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पतंजलि योग दर्शन-अभ्यास से ही चित्त दृढ़ होता है (patanjali yog darshan-abhyas

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।हिन्दी में भावार्थ-चित्तवृतियों पर नियंत्रण अभ्यास तथा वैराग्य से होता है।तन्न स्थितो यत्नोऽभ्यासः।हिन्दी में भावार्थ-चित्त की स्थिरता के लिये जो प्रयास किया जाता है उसे अभ्यास कहा जाता है।स तु
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रुओं पर दंड का प्रयोग अवश्य करें (kautilya darshan-shatru aur dand)

उत्साहदेशकालेस्तु संयुक्तः सुसहायवान्।युधिष्ठिर इवात्यर्थ दण्डेनास्तन्रयेदरन्।।हिन्दी में भावार्थ-अपने अंदर उत्साह का निर्माण तथा देश काल का ज्ञान प्राप्त करते हुए बलवान युधिष्ठर के समान शत्रु को परास्त करें।आत्मनः शक्तिमुदीक्ष्य दण्दमभ्यधिकं नयेत्।एकाकी
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपाय करने से सफलता मिलती है

सहस्त्रात्पृलुत्य दुष्टेभ्यो दुष्करं सम्पदर्ज्जनम्।उपायेन पदं मूघर्िल् न्यस्यते मतहस्तिनाम्।।हिन्दी में भावार्थ-हजार दुष्टों पर आक्रमण कर भी संपत्ति प्राप्त करना कठिन है पर उपाय किया जाये तो मतवाले हाथी पर भी अपना पैर रखा जा सकता है। वाळ्मानमयः खण्डं
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भर्तृहरि शतक-अल्पज्ञानियों के स्वर्ग पाने की इच्छा

उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।हिन्दी में भावार्थ-प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।स्वपरप्रतारकोऽसौ
 
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चाणक्य नीति-विद्वान एकाग्रता से अपना काम स्वयं करते हैं (kam aur dhyan-chankya neeti)

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरःदेशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकायणि साधयेत्।।हिन्दी में भावार्थ-ज्ञानी मनुष्य को बगुले की तरह एकाग्रता के साथ अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार ही अपना काम करना चाहिये। प्रभूतं कार्यमल्पं वा
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मनुस्मृति-भोजन के बाद गीत-संगीत सुनकर ही शयन करें (dinner and music-hindi adhyamik sandesh)

तत्र भुक्तपर पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः।संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः।हिन्दी में भावार्थ-भोजन करने के बाद गीत संगीत का आनंद उठाना चाहिये। उसके बाद ही शयन के लिये प्रस्थान करना उचित है।एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः।अस्वस्थः
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विष के प्रतिदिन दर्शन से मन कलुषित होता है (hindi adhyamik gyan sandesh-vish darshan)

चकोरस्य विरज्येत नयने विषदर्शनात्।सुव्यक्तं माघति क्रोंचो प्रियते कोकिलः किल।हिन्दी में भावार्थ-विष को देखने मात्र से चकोर पक्षी की आंख लाल हो जाती है और कोकिल तो मृत्यु के गाल में ही समाज जाता है।नित्यं जीवस्य च ग्लानिर्जायते विषदर्शनात्।एषामन्यतमेनापि