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लक्ष्मण रेखा …, किंतु रामचरितमानस, महाभारत एवं रामायण में इसका उल्लेख ही नहीं! (द्वितीय भाग – रामचरितमानस)

पिछली पोस्ट (12 मई 2010) में मैंने अपने मन में उठे इस प्रश्न का जिक्र किया था कि ‘लक्ष्मण रेखा’ का रामकथा के अंतर्गत घटित किसी घटना से क्या वाकई कोई संबंध है । जिन तीन ग्रंथों में मैंने उत्तर खोजने की चेष्टा की उनमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला । उनमें से एक
 
योगेन्द्र जोशी
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महेन्‍द्र 'नेह' के दो वर्चुअल काव्‍य पोस्‍टर

महेन्‍द्र 'नेह ' की उपरोक्‍त दोनों कवि‍ताएं और डि‍जायन रवि‍कुमार ,रावतभाटा, के ब्‍लॉग ' सृजन और सरोकार' से साभार यहां दी जा रही हैं।कवि‍ता और पेंटिंग का उनके ब्‍लॉग पर सुंदर संगम दि‍खाई देता है।
 
jagadishwar chaturvedi
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महेन्‍द्र नेह के ताजा संकलन 'थि‍रक उठेगी धरती' से ताजा कवि‍ता - उन्‍हें हाजि‍र करो

उन्‍हें हाजि‍र करो   सपने हमारे ,जो थे हमें जान से प्‍यारे हवन हुए हमारी ही आंखों के सामने धू- धू कर जले, वे जो हमारे ही ऑगन में पले तुलसी के बि‍रवे की तरह हमारी सॉंसों के बीच बढ़े कि‍सने जलाया उन्‍हें ? कि‍सने चढ़ाई उनकी बलि‍ भय कब घुसा और खरीद
 
jagadishwar chaturvedi
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प्रोफेसर कल्‍याणमल लोढ़ा नहीं रहे

प्रोफेसर कल्‍याणमल लोढ़ा का कल रात ढ़ाई बजे के करीब नि‍धन हो गया, वे लंबे समय से जयपुर में अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। उनका जन्‍म 28 सि‍तम्‍बर 1921 को हुआ था। उन्‍होंने सन् 1948 से कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में अल्‍पकालि‍क शि‍क्षक के रूप
 
jagadishwar chaturvedi
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म सप्‍ताह : मध्‍यवर्ग की मुक्‍ति‍ का मार्ग और मुक्‍ति‍बोध -चंचल चौहान

मुक्तिबोध का सारा लेखन भारत के मध्यवर्ग को संबोधित है और उससे कहा जा रहा है कि भारत के अगले विकास के लिए तुम्हें अपनी मिथ्या चेतना की जकड़बंदी से मुक्त होना चाहिए , और उस सर्वहारावर्ग का साथ देना चाहिए जो भारत को आगे के विकास की ओर ले जायेगा और तुम्ह
 
jagadishwar chaturvedi
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मुक्‍ति‍बोध जन्‍म दि‍न नेट सप्‍ताह पर वि‍शेष : जनपक्षधरता और पारदर्शि‍ता के आदर्श थ्‍ो मुक्‍ति‍बोध

शि‍वराम  मुक्‍ति‍बोध के बारे में आज कोई भी पुनर्पाठ अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद और सांस्‍कृति‍क राष्‍ट्रवाद को दरकि‍नार करके नहीं बनाया जा सकता है। आज सारी दुनि‍या अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद की आर्थिक -राजनैति‍क और सांस्‍कृति‍क नीति‍यों की ‍चपेट में है।
 
jagadishwar chaturvedi
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हि‍न्‍दी के कुंभकर्ण बुद्धि‍जीवी जागें

हि‍न्‍दी के साहि‍त्‍यि‍क और बौद्धि‍क कुभकर्ण सोए हुए हैं। उन पर कोई अंतर नहीं पड़ता कि‍ दुनि‍या में क्‍या हो रहा है वे मस्‍त हैं, मोटी-मोटी तनख्‍वाहें उठा रहे हैं। जो लेखक और बुद्धि‍जीवी हैं उनकी खाल इतनी मोटी हे कि‍ वे मोबाइल इस्‍तेमाल करना तक ठीक स
 
jagadishwar chaturvedi
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फि‍नोमि‍ना नामवर सिंह

वह साहि‍त्‍य में जि‍तना चर्चित है। नेट पाठकों में भी उतना ही चर्चित है। ‍ वह व्‍यक्‍ति‍ नहीं फि‍नोमि‍ना है। वह आलोचक है,शि‍क्षक है,श्रेष्‍ठतम वक्‍ता है,हि‍न्‍दी का प्रतीक पुरूष है, वह जि‍तना जनप्रि‍य है उतना ही अलोकप्रि‍य भी है,वह सत्‍ता के साथ है तो
 
jagadishwar chaturvedi
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युवा दखल: साहित्य का आधिक्य और पुरस्कारों की लालीपाप

पिछले दिनों अन्यान्य कारणों से पुरस्कार और उनसे जुड़े तमाम विवाद बहसों के केन्द्र में रहे। वैसे भी इस साहित्य विरोधी माहौल में जब साहित्य कहीं से जीवन के केन्द्र में नही है, बहसों के मूल में अक्सर साहित्य की जगह कुछ चुनिन्दा व्यक्ति, पुरस्कार और संस्
 
अशोक कुमार पाण्डेय