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सिर्फ एक कहानी हूँ मैं

अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....सबको प्यार देने की आदत है हमें,अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,कितना भी गहरा जख्म दे कोई,उतना ही ज्यादा मुस्कराने की
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लहु और आंसु-हिन्दी शायरी (lahu aur ansu-hindi shayri)

जमीन पर लहु बिखरा पड़ा हैफिर भी उनका बयानकिन्तु और परंतु शब्दों के साथ खड़ा है।मरने वालों पर बोले वह कुछ शब्दपर कातिलों का दर्द भी बयान कर गयेहैवानों के इंसानी हकों के साथज़माने से लड़कर उन्हें जिंदा रखने का जिम्माउनकी रोटी के गहने में सच की तरह जो जड़ा है।
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फिर भी हम चलते रहे

ग़मों के कांटे चुभते रहे, फिर भी हम चलते रहे| मिलते रहे सभी से मगर, अपने दायरों में सिमटते रहे| फिर भी हम चलते रहे … मुरझाये से रहे उम्र भर, आरजू के गुल महकते रहे| फिर भी हम चलते रहे … फिर मिले बिना शर्त प्यार, बच्चों से हम
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रोता क्यों नहीं

तडपता है तो रोता क्यों नहीं, रात है ज़ालिम तू सोता क्यों नहीं| है अगर जिंदिगी कोई क़र्ज़ तुझपे, फिर खामोश ढोता क्यों नहीं| तडपता है तो रोता क्यों नहीं … गर नहीं इक्तेहार में कुछ तेरे, कर लेता समझोता क्यों नहीं| तडपता है तो रोता क्यों
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कौन लेके चिराग आया है

हम तो अंधेरों में ही खुश थे, कौन लेके चिराग आया है| रोशन है हर कोना ज़हन का, मुद्दत में अक्स नज़र आया है| ना मिला वो गले ना ही सही, बेहरहाल उसने हाथ बढ़ाया है| उसकी अमदगी का मुन्तज़िर था ‘वीर’, टूटे ख्वाबों से दिल सजाया
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पसीना है पवित्र नदी-हिन्दी शायरी (pasnina hai pavitra nadi-hindi shayri)

मेहनतकशों की किस्मत मेंआरामदायक गद्दे इसलिये भी नहीं आते हैं,उनके लिये रोगों का  होना जरूरी हैजो अमीरों के ही हिस्से में आते हैं। तीर्थ में जाकर सर्वशक्तिमान के दर्शन करस्वर्ग मिल जाता,पर वहां पवित्र सरोवरों मेंस्नान कर भीदेह का कूड़ेदान साफ नहीं हो
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बीस साल पहले - सुधा सिंह

                                          छब्बीस
 
jagadishwar chaturvedi
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पिछली रात, शहर की, हर आँख, रोई है

इतने निष्ठुर,इतने निर्मम,ये बच्चे,अपने से नहीं लगते,फ़िर किसने ,ये नस्लें ,बोई हैं॥किस किस के ,दर्द का,करें हिसाब,लगता है,पिछली रात,शहर की,हर आँख,रोई है॥सपनो का,पता नहीं,मगर नींद तो,उन्हें भी,आती है,जो ओढ़ते हैं,चीथरे, या ,जिनके जिस्म पररेशम की,लोई
 
अजय कुमार झा
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गैरों से दुश्मनी की, कहाँ है फुरसत, हम तो अपनों से ही, उलझते जा रहे हैं।

मर रहा है ,हर एहसास आज,और रिश्ते भी ,दरकते जा रहे हैं॥अब ख़ुद पर बस नहीं,कठपुतली , बन, वक्त के साथ,थिरकते जा रहे हैं॥लगे तो रहे, ताउम्र, पर जाने,निपटाए काम, कि हम खुद ही , निपटते जा रहे हैं॥गैरों से दुश्मनी की,कहाँ है फुरसत,हम तो अपनों से ही,उलझते जा रहे
 
अजय कुमार झा
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लोहरी मुबारक

आया ख़ुशी का त्यौहार है,फसलों में भी लोहरी की बहार है,सरसों के खेतों से मक्के के खेतों तक, छेड़ा यह कैसा मल्हार है। नाचो गाओ धूम मचाओ, ढोल नगाड़ों पे गिद्दा पाओ। छोटे बच्चों में रेवड़ी और मूंफली बत्वाओ। कुछ देर के लिए सब परेशानियाँ भूल जाओ। मदमस्त होकर
 
पियूष अग्रवाल
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पुराना वर्ष चला गया..

वो कहतें हैं पुराना वर्ष चला गया... मैं कहता हूँ वर्ष कहीं जाता नहीं... यह सिर्फ भ्रम है ये दर्ज हो जाता है इतिहास के सफ्हों में एक और सफ्हा बन कर जैसे कि हमारे कर्म!!!
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ये अरमान

अरमान' उढते है, कभी भी कहीं भी। अरमान मरते हैं, कभी भी कहीं भी। लाखों अरमान, ऐसे ही क्षण प्रतिक्षण, जन्‍मते और मरते हैं कभी भी कहीं भी। क्‍योंकि.... पालने वाले इन अरमानों को, भी, उढते और मरते हैं कभी भी कहीं भी। ये अरमान जुडा करते हैं कहीं जन्‍म से त
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कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा

थक रहे है पाँव लेकिन मन थका लगता नही. आ रही है सांझ लेकिन पथ चूका लगता नहीं. कारवां के साथ रहकर मैं अकेला ही रहा , ठौर तो मिलते रहे पर घर मिला लगता नहीं. बीज थे संकल्प के वट-वृक्ष बनने के लिए. रीढ़ में थी ग्रंथियां यह तन तना लगता नहीं. बोझ थी यह जिंद
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प्रतीक्षारत हूँ !!!!!!

सरिताओं का गहरा सागर उमड़ा था . जब देखा था तुमने . चाहत भरी निगाहों से मुझे! चाहता था डूब जाऊं उनमे , पर, नही पा सका तुम्हारा वह अस्तित्व फिर भी "प्रतीक्षारत " हूँ , इसीलिए आज तक ! की कभी तो मिलोगी तुम ख्वाब में या ख़यालों में , एक अ-स्पस्ट सी परछाई ब
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दिल की बहियों से नाता तोड़ लिया है-हिंदी शायरी

घर बसते और सजते हैं पर फिर भी रिश्तों की खुशबू से क्यों नहीं महकते हैं अपने लिए ही जी रहा है हर कोई दूसरे के दर्द का किसी को नहीं होता अहसास छत पर नहीं डालते दाना फिर भी भूखे ही पक्षी चहकते हैं करते हैं सब लोग एक दूसरे के वफादार होने की कोशिश मौका पड
 
मस्तराम आवारा
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रश्मि खेरिया की ताजा कविता 'स्वाद'

स्वाद बादलों के साथ -साथ दौड़ रहा मन मेरा भी खेत खलिहान नदी -नाले रिश्तों के जंगल --- सब पीछे छूटते रहे बस लिया स्वाद मैंने भीगने का
 
jagadishwar chaturvedi
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कोई दोस्त ऐसा

कोई दोस्त ऐसा बनाया जाये, जिसके आसुओं को पलकों में छुपाया जाए, रहे उसका मेरा रिश्ता कुछ ऐसा, की अगर वो रहे उदास तो हमसे भी न मुस्कुराया जाये आपने अपनी आँखों में नूर छुपा रखा है, होश वालो को दीवाना बना रखा है, नाज़ कैसे न करू आपकी दोस्ती पर, मुज जैसे
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ना ज़मीन, ना सितारे चाहिए

ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए, दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए, ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए, मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए, कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ, दिल मे उस के, अपने लिए
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जुदां-जुदां की हरकते हैं जिन्दगी, मत दिखा घाव अपने औरों को

जुदां-जुदां की हरकते हैं जिन्दगी सिर्फ ‘स्व’ में उलझ गई है जिन्दगी ।  नखलिस्तां के कारवां भी हैं घबराते है भयानक दानव ऐसी जिन्दगी ।  क्यों हुआ विद्रूप अब यह फिजा कैसे समझे फुर्सत से अब जिन्दगी । जहां-जहां भी पड़ती है नजरें हमारी जज्बाती नासूर
 
RAVI PUROHIT
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रधिया

रधियामर-मर कर जीने का उपक्रम करती है रधिया, तगारी के सम्बल से आठ जनों की भूख को आश्वस्त करती है वह !बल पड़ती रीढ की मालकिन/ शर्म-शाइस्तगी से सजाती रहती है गिट्टियां तरल कोलतार में मरणासन्न
 
RAVI PUROHIT
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हिन्दी कविता

कब तकआखिर कब तक बनायेंगी घोंसले ये भद्दी चिङियां तुम्हारे बीझे कलेजे में कब तक पङेगी जयमालाएं उनकी कबूतर-सी गर्दन में देश के बर्णधार जुझारू पुष्प-से गुंथे बेचारे कब तक छटपटाते रहेंगे इस कपट-कीचङ में  छाती के छिद्रों में चोंचे मारे मनचली और कहे- -आज,
 
RAVI PUROHIT
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नस्ती सी पल्लवी

मैं वंच्य सी, एक वंचिता, जिसे प्रायः सभी ने ठगा. वृषक तो आए, कई मुझ तक, हो लालायित इस नीरव योवन पर, किंतु वहन न किया मेरा... इस पर भी अंजिर तक मेरे, प्रेष्ठ तुम्हारा यूं आना और आकर चले जाना... सहसा कभी यूं ही मुझ नय को नीरव ध्वनि से पुल्कित करना, सच!
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चलो छोडो , रहने दो ...............

तुम क्यों हो,यूं परेशाँ,मेरी खातिर,चलो छोडो,मेरे जज्बात,मुझ ही तक,रहने दो॥जो अब भी ,न समझे तुम,मेरी नज़रों ,की भाषा ,ख़त्म करो,ये बात ,यहीं तक,रहने दो॥मैंने कब कहा,की तुम,मुझे अपना,हमकदम बना लो,जो रास्ते,और भी हैं,चले जाओ खुशी से,ये साथ,यहीं तक,रहने
 
अजय कुमार झा
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हमारी बिसरती परम्पराओं का आइना ये बक्सा

क़स्बा के ब्लॉग पे एल्मुनिम के बक्से की बहुत अच्छी कविता पढ़ी। मेरे अन्दर के कवि से रहा नही गया और मैंने कविता को अपनी तरफ़ से और विस्तार दे दिया। http://naisadak.blogspot.com/2009/03/blog-post_15.html कुछ सपने और ढेर सारी भावनाओ का अथाह समंदर बना जात
 
राकेश
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हम हद से गुजर जायेंगे

आपकी मोहब्बत में वादा रहा आपसे उमर भर चाहत निभायेंगे, मत रूठना आप हमसे कभी भी,वरना हम जान देकर आप को मनायेंगे! इस कदर ना हर बात यारों से पुछो जो बात 'राज; की है इशारों से पुछो, लहर से खेलना समंदर का शौक है लगाती है चोट कैसे किनारों से पुछो!