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हिंसा का दुश्चक्र और सत्ता का “नवउदारवादी” खेल

जनतांत्रिक सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी कोई सत्ता अगर अपने तंत्र में जन की वाजिब भागीदारी तय नहीं कर पाती तो उससे उपजी विडंबनाओं का चुनौती के रूप में तब्दील हो जाना स्वाभाविक है। विचित्र यह है कि संघर्ष के ‘लोकप्रिय’ तरीकों का हश्र जानने के बावजूद सत्ता
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खूनखराबे का रोग-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka rog-hindi shayari)

वह खून की होली खेलकरलाल क्रांति लाने का सपना दिखा रहे हैं,भरे पेट उनके रोटी सेखेल रहे हैंबेकसूरों की शरीर से निकली बोटी से,हैवानियत भरी सिर से पांव तक उनके वही गरीबों के मसीहा की तरह नाम लिखा रहे हैं। ----------गोली का जवाब गोली ही हो सकती हैजानवरों से
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सरकारों के लिए नक्सलियों से लडऩा मजबूरी है, कोई शौक नही

बात तो उसी से की जा सकती है जो बात करना चाहे। चिदंबरम तो कई बार कहचुके हैं कि 72 घंटे के लिए हिंसा बंद करें तो वार्ता हो सकती है। 72घंटे होते ही कितने हैं। मात्र 3 दिन 3 रात। नक्सलियों के पास बातचीत काकोई प्रजातांत्रिक मुद्दा हो तब न वे बात करें। बारूद,
 
विष्णु सिन्हा
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ये कैसी मुहब्‍बत...........

बात दिल्‍ली शहर की है, देश की राजधानी, जो विकास के मामले में अग्रणी है। लेकिन महिला व पुरूष के मामले में उस शहर की सोच भी देश के बाकि हिस्‍सों की तरह ही है। 13 अगस्‍त को हुई एक घटना ने दिल को हिला कर रख दिया और इस घटना ने मर्दवादी मानसिकता को फिर उजा
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क्‍योंकि वे नहीं जानते क्‍या कर रहे हैं.....

उड़ीसा का ऐसी आगजनी से पुराना नाता है. ईसा मसीह के जन्‍मदिन पर कंधमाल में चर्चों पर हमले कर आग लगा दी गई. कुछ साल पहले ऐसी ही एक आग में ग्राहम स्‍टेंस और उनके बेटे को जिंदा जलना पड़ा था. हत्‍यारा आज भी जीवित है और हिंदुत्‍व के रखवालों ने उसे हीरो बना
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लुधियाना को ना लग जाए मुंबई का रोग

एक प्रवासी मजदूर को पुलिसवाले और स्थानीय लोग मिलकर पीट रहे हैं।   लुधियाना में हुई हिंसा का यह फोटो आज एक अखबार में छपा है। फोटो यह बताने के लिए काफी है कि 'दिल लेने दिल देने में नंबर वन' पंजाबियों के दिलों में सिर्फ 24 घंटे के भीतर ही पुलि
 
प्रभाष झा
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प्यार की राह दिखा दुनियाको...

ये लेख मैंने तब लिखा था,जब गुजरात मे हुए फसांदों से मेरा मन तड़प उठा था.... कयी महीनो से मैं और आपलोग भी, गुजरात मे घटी घटनायों का ब्योरा पढ़ रहे हैं । कोईभी तर्क संगत व्यक्ती जो घटा है या घट रहा है, उस से सहमत नही हो सकता। इस मे कोई दो राय नही। अपनी
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मुंबई में अब कहां बची है खुली जगह

शाम को टहलने निकला तो बहुत अच्छा लग रहा था। आज पहली बार यहां रहते हुए सुंदर से पार्क में अलग अलग से चेहरों को देखते हुए, उनकी गतिविधियों और हावभाव को निहारते हुए अपनी वॉक पूरी कर रहा था। यहां ठीक मेरी बिल्डिंग के सामने टहलने के लिए एक बहुत ही कम जगह
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धर्म कोई निजी परिघटना नहीं है

मित्रो, 'धर्म का विकल्‍प: एक पुनर्विचार' शीर्षक लेख की यह दूसरी किश्‍त। धर्म कोई निजी मान्यता या परिघटना नहीं है जो कहते हैं कि धर्म एक निजी आस्था, विश्वास और मान्यता की बात है। वे दरअसल भोले हैं या चालाक। जैसे भ्रष्टाचार, ईमानदारी, बेईमानी, चरित्रही
 
कुमार अम्‍बुज
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