हिंसा का दुश्चक्र और सत्ता का “नवउदारवादी” खेल
जनतांत्रिक सिद्धांतों की बुनियाद पर खड़ी कोई सत्ता अगर अपने तंत्र में जन की वाजिब भागीदारी तय नहीं कर पाती तो उससे उपजी विडंबनाओं का चुनौती के रूप में तब्दील हो जाना स्वाभाविक है। विचित्र यह है कि संघर्ष के ‘लोकप्रिय’ तरीकों का हश्र जानने के बावजूद सत्ता
Jun 02 2010 08:37 PM



Shuffle








