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व्यक्ति के चार प्रकार

संता और बंता ने व्यक्तित्व निर्माण के लिए विशेष कक्षा में प्रवेश लिया ...पहले ही दिन उपदेशक ने उन्हें पढाया ...." व्यक्तित्व विकास की इस कक्षा में आपका स्वागत है ...मैं आशा करता हूँ कि मेरे अनुभव और ज्ञान से आपलोग लाभान्वित होंगे ...आईये ...सबसे पहले हम
 
वाणी गीत
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पत्नियाँ पतियों को क्यों डांटती रहती है?

पिछले दिनों फ्रेंडशिप डे आया तो मोबाइल पर कई दोस्तों के सन्देश आये. कुछ मित्रो को हमने भी सन्देश भेजे. एक दोस्त ने बंबइया हिंदी में कुछ उस तरह इजहार ए मोहब्बत की- गॉड अपुन से पूछा किधर जाना मंगता? स्वर्ग या नर्क? अपुन बोला- नर्क. अपुन को मालूम, तुम स
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त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत
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किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का

पत्नी बोली- तुम क्या कमाते हो असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है उसके बीवी रोज एक किलो प्याज खरीदती है और सारा परिवार खाता है तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ तो आंखें लाल पीली होने लगती है और प्याज के नाम पर पतलून ढीली होने लगती है. मैने कहा- फिजूल के खर्च
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रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो
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व्यंग्य- बढे बालो से योग प्रशिक्षण के रिश्ते

बढ़े बालों से योग प्रशिक्षण के रिश्ते वीरेन्द्र जैन इन दिनों योग बहुत फरफरा रहा हैं। जिसे देखों वही हाथ, पाँव, गर्दन, पेट, पीठ, आदि ऊँचा नीचा आड़ा तिरछा करने में जुटा हुआ है। लोग सासों पर साँसे लिये चले जा रहे है। और ज़ोर ज़ोर से लिए चले जा रहे हैं। अब क
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य मुद्रा गाथा

व्यंग्य मुद्रा गाथा वीरेन्द्र जैन वैसे तो मुंह से मुद्रा शब्द का उच्चारण होते ही मन में सोने के नही तो लोहे के सिक्के खनखनाने लगते हैं किन्तु मेरा आशय उन मुद्राओं से न होकर मनुष्य की मुद्राओं से है। योग और ध्यान में मुद्राओं को विशेष महत्व प्रदान किय
 
वीरेन्द्र जैन
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रीठेल : कलियुग मे लंका सेतु निर्माण

साथियों, पेश है, लगभग तीन साल पहले लिखा हुआ मेरे एक लेख का रीठेल। यह एक काल्पनिक लेख है, इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नही है। इसलिए इसको सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्टिकोण से ही पढा जाए। सबसे पहले तो एक डिसक्लेमर: यह एक काल्पनिक लेख है,
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भैंस चालीसा..............

भैंस चालीसामहामूर्ख दरबार में, लगा अनोखा केस फसा हुआ है मामला, अक्ल बङी या भैंस अक्ल बङी या भैंस, दलीलें बहुत सी आयीं महामूर्ख दरबार की अब,देखो सुनवाई मंगल भवन अमंगल हारी- भैंस सदा ही अकल पे भारीभैंस मेरी जब चर आये चारा- पाँच सेर हम दूध निकारा कोई अकल ना
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महबूबा ..महबूबा ..

यदि इस पोस्ट का टाइटल पढ़कर आपको फिल्म शोले की याद आ जाये तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, लेकिन मैं ना तो आज आपको फिल्म शोले का गाना सुना रहा और ना ही अपनी महबूबा के बारे में बता ‘सच का सामना‘ कर अपने एक अदद पत्नी को परेशान ही कर रहा हूँ। [आगे
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पत्नी के मायके जाने पर - कुछ नोट्स

व्यंग्य पत्नी के मैके जाने पर वीरेन्द्र जैन पत्नी ज्ञान की दुशमन होती है, खास तौर से अंर्तज्ञान की। यही कारण है कि अंर्तज्ञान प्राप्त करने वाले बड़े बडे महापुरूषों ने ज्ञान पाने के लिए सबसे पहला काम यही किया कि पत्नी से छुटकारा लिया। बहुत ही छोटी छोटी
 
वीरेन्द्र जैन
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शक्लें देखो इन युवा मंत्रियों की

इसे कहते हैं चार आने का चना और चौदह रूपये का मसाला.. मसाला भी साला ऐसा कि दोनों टाइम हाहाकार मचा दे..इनपुट में भी और आउटपुट में भी। ये ज्ञान वाली बात मैंने मुफ़्त में इसलिए कही, क्योंकि लम्बे अध्ययन और गहन चिन्तन के उपरान्त ये दो कौड़ी का निष्कर्ष मे
 
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