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तू नहीं तुम.....;तुम नहीं आप

 प्रेम को भाषा की ज़रूरत थी ही नहीं....ऐसा इतिहास में दर्ज था...अब भाषा ज़रूरी हो गई थी । बहुत मेहनत से पुरुष नई भाषा ईजाद कर रहा था। उसके निपट प्रेमी से भाषा विज्ञानी हो जाने का भेद दोनों पर ही अब खुला था। हर दिन वह नया शब्‍द गढ़ता,  उसका अर्थ
 
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...तो ये जनम ज़ाया हो जाता

कई मुहूर्त हवा का द्वार खटखटा कर चले गए...कई मौसम अपनी गुमशुदगी के अभिशाप को तोड़ देने की गुज़ारिश करते-करते रह गए ..कई सदियां गुज़र गई थीं....पुरुष को पथराए हुए। न जाने कब से स्‍त्री उसकी ओर एकटक देख रही थी बिना थके....बिना रुके...बिना यह कहे कि वो
 
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