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तुम्हारी मर्ज़ी

किसने कहा थाखोल दो खिड़कियाँ?अब बौछारें पड़ेंगीतो उनकी छींटेंभिगो देंगी घर के कोने,हवाएँ आयेंगींऔर फड़फड़ायेंगेडायरी के पन्ने,कुछ तिनके, कुछ धूल,कुछ सूखे पत्ते,डाल से टूटकर आ जायेंगेहवाओं के साथ अनचाहे ही,ताज़ी हवा और रोशनी के लियेये सब तोसहना ही
 
mukti
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कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा ... व्हीडियों देख कर समझ सकते हैं कि कैसे?

वैसे तो हमारे ब्लोग जगत में तरह-तरह की हवाएँ बहती हैं। जब टिप्पणी हवा बहती है तो सभी टिप्पणीमय हो जाते हैं और कभी कभी विवाद की हवा बहती है तो वह उग्र रूप धारण करके आँधी भी बन जाती है। पर आज ललित जी ने ब्लोगजगत में "फागुनी बयार" बहाई है। अब फागुनी हवा बहे
 
जी.के. अवधिया
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सिर्फ 'हवा' खा!

भारी महंगाई सिर पे गरीब क्या खायेगा पानी भी हुआ महंगा ,बोल क्या पिएगा। इसलिए प्यारे तू सिर्फ हवा खा और हवा पी। वह भी था जमाना,जब दूध-मलाई खाई आज तो हर शै ने प्यारे बुरी मिलावट पाई ,इसलिए प्यारे तू सिर्फ हवा खा,और हवा पी।
 
पिंटू कुमार
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