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..वैसे हम, बचपन के घनिष्ठ हुआ करते थे.....

कक्षा छोटी थी, हम छोटे थे.. हमारा आकाश छोटा था.  कक्षा बड़ी हुई, हम बड़े हुए, हमारा आकाश बड़ा हुआ.  मस्त थे, व्यस्त थे, हँसने के अभ्यस्त थे. त्रस्त हुए, पस्त हुए, सहने के अभ्यस्त हुए.  तब, परेशान होते थे, निहाल हो जाते थे. दुखी होते
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'