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आशिक का जनाज़ा उर्फ़ महबूबा की राहत

द जनाज़ा ऑफ़ महबूब निकला फ्रॉम द गली ऑफ़ महबूबा विथ लोट्स ऑफ़ जोर शोर सुनकर महबूबा झांकी फ्रॉम द डोर एंड बोली- 'आखिर मर ही गया हरामखोर'.
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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सस्ती शायरी के फ़ायदे

ऐ दोस्त तू भी कर सस्ती शायरी मेरी तरह तेरा भी नाम हो जाएगा लोग फेका करेंगे अंडे-टमाटर शाम की सब्जी का इंतजाम हो जाएगा.
 
विजयशंकर चतुर्वेदी