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उत्तर भड़ किंवाड़ - 2

भाग एक का शेष ..........." नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है | इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और
 
Ratan Singh Shekhawat
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उत्तर भड़ किंवाड़

काक नदी की पतली धारा किनारों से विरक्त सी होकर धीरे धीरे सरक रही थी | आसमान ऊपर चुपचाप पहरा दे रहा था और नीचे लुद्रवा देश की धरती , जिसे आजकल जैसलमेर कहा जाता है , प्रभात काल में खूंटी तानकर सो रही थी | नदी के किनारे से कुछ दूरी पर लुद्रवे का प्राचीन
 
Ratan Singh Shekhawat
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वह राम ही था –२

भाग -१ से आगे ..... जिसने रावण जैसे आततायी को भी मारने से पहले उसे सुधरने का मौका दिया और युद्ध टालने की हर संभव और उचित चेष्टा की - लक्ष्मण के मूर्छित होने पर जिस भाई की आँखों में प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी और जो संयोग-वियोग रहित होकर भी साधारण
 
Ratan Singh Shekhawat
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वह राम ही था

जिस पुरुषोतम ने अजन्मा होकर भी महाभाग दशरथ के यहाँ जन्म लिया -जिसकी सेवा के लिए स्वर्ग के सुख भोगकर अनेक देवता इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में अवतरित हुए थे -जिसके द्वार पर सदैव भगवान् शंकर योगी का भेष धारण कर केवल उसका दर्शन करने आते थे - वह राम ही था
 
Ratan Singh Shekhawat
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उत्तरा की मांग -2

पिछले का शेष .....और विदा पाकर अभिमन्यु तीर की भांति चला युद्ध क्षेत्र में |'सप्य्क सप्य्क क्लाक ' तलवार चल रही थी जैसे मछली पानी में क्रीडा कर रही हों | सधे हुए हाथो से छूटे हुए ब्रह्मास्त्र की भांति वह टूट पड़ता था और जिस पर टूटता था उसके जीवन और
 
Ratan Singh Shekhawat
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उत्तरा की मांग

"मै युद्ध प्रयाण कर रहा हूँ | पिताजी आज यहाँ नहीं है | अपने हाथ दिखाने का स्वर्णिम अवसर आया है | श्री कृष्ण ने कहा है कि ऐसा अवसर भाग्यवान क्षत्रिय को ही मिलता है | मुझ पर आज भाग्य प्रसन्न हुआ है |"उसकी आँखे नीची ही रही |' मै महारथियों से भिडूगा - अकेला
 
Ratan Singh Shekhawat
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सुख और स्वातंत्र्य -4

भाग -१ ,भाग-२ ,भाग-३ का शेष ...........चित्रगुप्त ने चंद्रसेन की ओर देहकर फिर कहना शुरू किया ....एक दिन इसने सोचा -क्यों नहीं रक्षा के आक्रमणात्मक पहलु पर विचार किया जाये और उसके घोड़े अजमेर की ओर मुड गए | सरवाड़ के शाही थाने में एक दिन बड़ी अवर कुहराम मच
 
Ratan Singh Shekhawat