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उसके परस बिन मनवा है सूना

उसके परस बिन मनवा है सूनाजीवन में कैसी बहार रे ?अन्तर में मेरे लवना थी लागीसांचे में प्राण ढले रे ,रैन अँधेरी थी देखा ये सपनामिट गया कैसे सवेरेफिसला कदम क्या खोई है सरगमहो गई भार सितारा रे || उसके ....निराशा में चित्त का रहा ना सहारामाया को खूब जुटाई
 
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बहका दिया किसी ने

बहका दिया किसी ने पिलाकोई जाम मुझे अरमानों का ||राह के काँटो में उलझ गया मैं तो आँख लगी देखा पिछड़ गया मैं तो किसने बताया पंथ मुझे युग युग के परवानों का ||देखे मैंने सांचे रे जिन्दगी में ऐसेआंसुओं को पूछा तो मुस्कराये कैसे जितना भुलाया याद रहा ,कर्जा इन
 
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बनी ना बिगड़ेगी रे

बनी ना बिगड़ेगी रे , कहानी रे मनवानसीबों की मारी रेखिला दिए है फूलों को कांटो में भी हमनेयुगों से भरी है पहली , धरा ने किलकारी रे ||नसीबों की मारी रे ||पीड़ा लेकर खुशियाँ देना कर्जा है जो उसकाकौम के चरणों में रहना सदा ही बलिहारी रे ||नसीबों की मारी रे
 
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पवन गुन गुना गीत गाता है

पवन गुन गुना गीत गाता हैप्रीत उसकी युगों पुरानी हैआँधियों के इतिहास लम्बे तोएक पौधे की भी कहानी है |उगे है चीर धरा की छाती कोकोंपलों के अंदाज जंगल मेंकोई मिटता कोई उगा करता हैनित्य ही सृष्टि के दंगल मेंये दरखतों की उंचाई तो -एक बीज की ही निशानी है |क्या
 
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कहा था कि देखो

कहा था कि देखो कहीं दूर गातीजो ऊँचे सितारों से कौन आ रही है ?ये सज्जा फटी सी है चिथड़े लपेटे ,निगाहें उठी पर अकिंचिन सी लगती |कहा था कि देखो कहीं दूर गातीजो ऊँचे सितारों से कौन आ रही है ?ये सज्जा फटी सी है चिथड़े लपेटे ,निगाहें उठी पर अकिंचिन सी लगती
 
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मिटे तो हुआ क्या

मिटे तो हुआ क्या निशानी है बाकी ,कथाकार सोये कहानी है बाकी || शमाएँ जलाई रे अँधेरे मिटाए , बिछुड़े हों को भी रस्ते बताये |पतंगों ने जल के कहानी बनाई ,अभी किन्तु रस्में पुराणी है बाकी || १ || अनोखी कहानी है पतंगों की लेकिन , कैसे मिटेंगे इससे हमारे ये
 
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छुप बैठा कोई रे

छुप बैठा कोई रे जीवन सितार मेंजाने वो कैसे उतरे स्वर के निखार में ||इक रात ऐसी थी गहरे अँधेरे मेंजागी प्रतिज्ञा मेरी अपनों के घेरे मेंसपने वे सोये मेरे गहरे विचार में ||प्राण बटोही मेरे युग के प्रभात मेंचलते रहे है किन्तु ठहर न रात मेंभटके वे मेरे साथी
 
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मन का पंछी दूर गगन में

मन का पंछी दूर गगन में टोह लगाता आया रे |इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसी ने गया रे ||नदियाँ देखि पर्वत ढूंढे रत्नाकर आएलाख इशारे आने के पर मुझको न भाएउड़ता आया बोलो किसने ये अनुराग जगाया रे ||कैसी गांठे बाँधी थी जो खुलने न पाईरंगत कैसी युग भी बीते घुलने न
 
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भूल्या बिसरया भाईडां ने

भूल्या बिसरया भाईडां ने आज लवना लागी रे जागी रे जागी जागी दिवळे री जोत जागी रे बरसां सूं पतंगो आयो पांवणो समदर रै किनारे मेळो चालै नी पतंगा रे सुणीजै भागीरथ आया घरां आई गंगा रे बांटां रे घट-घट मे चानणोआज म्हारै मनडे रो सौवणो मोर नाच्यो रे परभातां री
 
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सरल है फूलों पे सोना

सरल है फूलों पे सोना काम , काँटों से यहाँ |किन्तु देखो किस मजे में जा रहा है कारवाँ ||ये मुसाफिर वे नहीं जिनको सहारा चाहिएसुनलो हमको बंदगी का बस इशारा चाहिएहै विदाई की ण रस्मे , प्यार का स्वागत कहाँ ||है न लेखा कौन साथी है या चल दिएदीप का जीवन है केवल
 
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आजा मौसमे बहार तू कहाँ

आजा मौसमे बहार तू कहाँ | ढूंढ़ते तेरे बागवां ||खुशियों के कोनों से आज राग छू गए ,भूली कहानी से प्राण फिर से आ गए |रंग क्या बदलते है थोड़ी देर देखना ,दास्ताँ बनेगी ये धरा स्वयं तू देखना ||गाफिल न ऐसे खेलेंगे आसमां - और ना रहेंगे मेजबाँ || १ ||उछाला है
 
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क्रांति का बजरा

क्रांति का बजरा चला सवेरे, धूप ढली घिर आये अँधेरेआज उठेंगे रे , भाग्य के सोये मौन चितेरेहांक उठाई वज्र गिराए , बने बनाये सभी मिटाएनिर्दोषों के खून में रंग के , रंग बिरंगे लाल रंगायेमानवता के मिट गए घेरे , ऐसे आये लाल सवेरे ||समता के झांसे में इधर भी ,
 
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हमें बहका न कोई लाया है

हमें बहका न कोई लाया है आये है हम |तेरी बगिया में नया पाया है जनम ||बड़ी बातों को समझने का अभी होश नहींकलियों में अभी फूलों का वो जोश नहींबड़ी शिद्दत से तेरी टहनी पे चटके है हम || तेरी बगिया ....तेरी झोली में कुछ रत्न की दरकार रहीजान क्यों ढुंढती हमको
 
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राह मिल गई साथ हो गए

राह मिल गई साथ हो गए और सुख का क्या करें ?बांह ले ली हो किसी ने चांदनी क्या करें ?वेदना के तीर पहुंचे भाव की पतवार लेफिर स्वरों की गोते खा ही ले मझधार मेंनवगीत लिखते है पुराने दर्द का हम क्या करें ?जहर खा कर भी सदा अमृत पिलाना चाहतेप्रीत की टुक कर्जदारी
 
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मैं बनजारा हूँ

मैं बनजारा हूँ कौन मेरा है मेरा साथी | प्रीत मेरी शरमाती ||बाळद लेकर चला युगों से , बन बन का मैं राही -२अरमानो की तस्वीरों पर , उलट गई है स्याही -२जब से हुनमें लगा पूछने कहाँ मेरी है थातीतब से ही मुझको हर महफ़िल उलझाती || १ || प्रीत मेरी ....मैं सपनो की
 
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कितनी आग भरी तेरी प्यास में

कितनी आग भरी तेरी प्यास मेंइतनी गहरी घटाएँ चारों ओर हैमीठे बोल रहे दादुर मोर हैचातक बोल मोती कितने बंद तेरे विश्वास में ||किस्मत को अंधियारे ने क्या खूब छलामेहनत से निष्ठा से मेरा दीप जलाउसकी लौ पे जलता रे पतंगे तू किसकी आश में ||पीड़ा कितनी मन के झूले
 
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अँधेरा है कितना और दीप कितने

अँधेरा है कितना और दीप कितने ,देखें इस दुनिया में कौन अपने |जिन्दगी की बाजी में अधूरे सपने ,पुरे करने वाले देखें मीत कितने ||राह न रुकेंगे झुकेंगे नहीं , मोड़ देंगे नदियाँ किन्तु मुड़ेंगे नहींखोल के तिजोरी आज देखेंगे ज़राकौन खोटा निकला है कौन है खरामोम के
 
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नए आने वालो

नए आने वालो , तुम्हे साधना की , अनोखी परम्परा मुझे है सुनानीसुखों को जलाके भी , सपने न टूटे , इसी पे हमें जिन्दगी है बितानीढूंढे सभी है सहारे , कहीं मिल जाये कोई हमारेथके किन्तु हिम्मत न हारे , चमकाए नभ में सितारेबहा हा युगों से यह मेहनत का निर्झर , कहीं
 
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जागरण की वेला का

जागरण की वेला का तू कौनसा सितारा है |मेरे मीठे सपनो का तू कौनसा इशारा है ||जिन्दगी की बाजी में किस्मतों का फेरा हैगूंजता रे दुश्मनों की जीत का नगारा हैकाल की नदी का तू कौनसा किनारा है ||फूलों का भरोसा दे काँटों ने ही पाला हैआज मेरी प्रीत का रे पतझड़ी
 
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होनहार के खेल - 5

भाग-1, 2, 3, 4 का शेष .............उस दिन के बाद निश्चिन्त होकर ढाई सौ वर्ष तक मैंने खूब भोग भोगे | अवर्णीनीय एश्वर्य का उपभोग किया | रंगीन और हसीन महफ़िलों में डूब गया , पर मुझे क्या मालूम था , कि भोग और एश्वर्य के उन मादक प्यालों में होनहार ने ऐसा जहर
 
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होनहार के खेल -4

भाग-1, 2, 3, से आगे ....पर होनहार क्या जबाब देता ? उसने आज तक मेरे किसी सवाल का उत्तर नहीं दिया है | उत्तर तो होनहार की शरारत का मैंने दिया था | महारावल लूणकरण के समय होनहार ने छल करना चाहा था | मैंने अपने मालिक को कहा - ' विवाह तो हो गया पर मेरा गौना कब
 
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होनहार के खेल -2

भाग-1, 2 से आगे .........जब सभी मेजबान चले गए , तब चंद मेहमान शेष रह गए और वे भी अंत में तंग आकर ताला लगाकर चले गए | सुनसान मेरा साथी बना | उसने भी एक दिन विदा ली और दुदा और तिलोकसीं आये | सिंहासन हाथ लगाते ही मैंने चेतावनी दी - ' सावधान ! मेरे विवाह का
 
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होनहार के खेल -2

भाग-1 से आगे ......देवराज की चौथी पीढ़ी पर भोजदेव ने शहाबुद्दीन गोरी की फ़ौज का सामना किया उर होनहार ने लुद्र्वा की रौनक सदा के लिए छीन ली | पर जैसल ने भोजदेव के उत्तराधिकारी के रूप में मुझ जैसलमेर दुर्ग को बसाया | संवत १२१२ से आज तक लगभग ८०० वर्षों में
 
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होनहार के खेल -1

कभी इस मार्ग पर घोड़े दौड़ते थे , कभी ऊंट दौड़ते थे , पर आज मोटरे दौड़ रही है | कभी इस मार्ग पर फौजे आती थी , कभी नगारे बजते थे , और आज सिर्फ यात्री आ रहे है और यात्री जा रहे है | कभी इस मार्ग पर जिन्दगी के कारवां गुजरते थे , कभी मौत के हरकारे दौड़ते थे पर
 
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क्षिप्रा के तीर -6

भाग-1, 2, 3, 4, 5, का अंतिम यदि कभी क्षत्रिय जाति का कोई देशभक्त संगठन हो, तो वहां कहना - ' इस संगठन के दुर्गादास जीवन भर तरसता रहा पर सफल नहीं हुआ और आप लोगों के लिए अप्रत्याशित सफलता पर उसने हार्दिक बधाईयाँ भेजी है |' यदि कौम के बन्दे कभी जंगल जंगल
 
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क्षिप्रा के तीर -5

भाग -1, 2, 3, 4 से आगे ...मेरी समाधि पर फूल चढ़ाये गए | मेरी गाथाएँ लिखी गई | मेरे वियोग में कविताएँ पढ़ी गई | मेरी जयन्तियां मनाई गई | मेरे लिए आंसू बहाए गए , लेकिन न उन फूलों में सौरभ था ; न उन गाथाओं में में आग थी ; न उन कविताओं में वेदना थी ; न उन
 
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क्षिप्रा के तीर -4

भाग-1 , 2 , 3 से आगे............. इतना होते हुए भी मुझे देश निकला दिया गया | मेरी अटूट निष्ठां और सतत सेवा के बदले मुझे काले वस्त्र ,काला घोडा और काली ढाल मिली | मैंने इस उपहार को भी ख़ुशी से स्वीकार किया और मैं चल पड़ा उस माँ मरुधरा से , जिसके लिए मैं
 
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क्षिप्रा के तीर -3

भाग-१,भाग -२ से आगे ..........खिंची मुकंद दास मेरे जीवन -दीपक में तेल भरता रहा और मैं जिन्दगी भर जलता रहा | जलता रहा और जल-जल कर जलने की कहानी को जीवन का नाम देता रहा | जब जलने का अमर इतिहास निर्मित हो रहा था , तब मैं बुझ भी कैसे सकता था | बड़ी कठिनाईयों
 
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क्षिप्रा के तीर -2

भाग- १ से आगे ....जो मुझे बुला रहा है - घोड़े पर चढ़ा हुआ , हाथ में भाला लिए | तो सुनें , उसके पास जाकर , वह क्या कहना चाहता है ?वि.स. 1695 की श्रावण शुक्ला चतुर्दशी को मुझे एक माता मिली और मैंने उस जननी को कभी लज्जित नहीं होने दिया | ममता के क्षण आये ,
 
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क्षिप्रा के तीर -1

चलूँ ! मालवा धरा निमंत्रण दे रही है | दो अँगुलियों से घूंघूट उठाकर देख रही है , मुझे आते हुए | उसके हरे भरे आँचल में आग की धड़कने सिमटी हुई है | ज्यों -ज्यों उज्जैन नगर समीप आ रहा है , त्यों त्यों रेलगाड़ी हांफती हुई जैसे पहुँचने के आतुर हो रही है और मैं
 
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चेतक की समाधि से -6

">भाग-१, भाग-२, भाग-३, भाग-४, भाग-५ से आगे ..........." आगे क्या बात हुई , मैं तो सुन ही नहीं सका और लड़खड़ा कर गिर पड़ा | जब होश में जागृत हुआ तो दोनों मुझ पर झुके हुए थे | महाराणा की एक कातर पंक्ति मुझे अभी तक याद है - " विधाता ! तुमने मुझसे क्या नहीं
 
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चेतक की समाधि से -5

भाग-१,भाग-२,भाग-३,भाग-४ से आगे ........' महाराणा प्रताप पीछा करने वाले शत्रुओं से यहाँ मारे जायेंगे | मैं इस होनी को देखना नहीं चाहता था और मैंने अपनी दयनीय असहायावस्था में आँखे बंद कर ली | पर कानों को कैसे बंद करता ? उनसे मैंने सुना - " ओ लीला घोडा रा
 
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चेतक की समाधि से -4

भाग-१ , भाग-२,भाग-३ से आगे..........." वातावरण की एकरूपता में इतना समय हो गया कि मुझ अभागे को ध्यान ही नहीं रहा, कि वे तो मुगलों से घिर गए | इतने में मैंने झाला सरदार को देखा | घेरे को तोड़ कर वे समीप आ गए और उन्होंने उनका मुकुट अपने सिर पर धारण कर लिया |
 
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चेतक की समाधि से -3

भाग -१ व भाग -२ से आगे ............" एक दिन संवत १६३३ के जेष्ट सुदी २ , तारीख ३० मई १५७६ बुधवार के प्रभात काल में उनके शिविर में मंद स्वर में कुछ मंत्रणा सी हो रही थी | एक स्त्री -कंठ याचना भरे शब्दों में अनुनय कर रही थी - " मैं नाचना चाहती हूँ , जी भर
 
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चेतक की समाधि से -2

भाग -१ से आगे ...........यह चेतक की समाधि है | मैंने झुक कर प्रणाम किया | महान चेतक और उसके अद्वितीय मालिक ! तुझे शतश: प्रणाम है और तभी एक गंभीर आवाज का प्रवाह बह चला - " पथिक ! जितना मैंने देखा उतना तुमने सुना भी नहीं | तुम्हारी तरह मेरे भी दिन थे
 
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भुलाए न भूले

भुलाए न भूले , सदियों पुराने , याद आ रहे है बीते ज़माने ||कभी वेद विद्या की शक्ति से था जीताकभी ज्ञान ध्यान और भक्ति से भी जीताकभी जग को जीता सुशासन के द्वाराप्रलय से ना डूबा हमारा सिताराबिना पंख ऊँची उड़ान भरी थी उड़ाने || याद आ ........दुखी जन के खातिर
 
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अपने ही सपनो का

अपने ही सपनो का मै तो बना रे सिपाही |कोई सराहे कोई बने हम राही || मै तो .....संघ के लिए ही मैंने सुख दुख त्यागा रेसोये सारा जग मेरा तन मन जागा रेअपनी तक़दीर का मै खुद ही गवाही || मै तो ....प्रेम के भावों की मै तो बेल बढ़ाऊंगाभूलें हो भटके हो चाहे गले से
 
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किसने मुझे कहा था , धोखा कभी न दूंगा

किसने मुझे कहा था , धोखा कभी न दूंगा |मैंने कहाँ कहा था , तेरा प्यार ही मै लूँगा ||जिसने दिया है जो भी , हंसकर लिया है मैंनेप्याले पिए जहर के , तेरे समझ के मैंनेअपने नहीं तो सोचा , गैरों को सहूंगा |किस्मत के दांव थे हिम्मत से मैंने खेलेसंचय लुटा के मैंने
 
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आंसू इक उमड़ा

आंसू इक उमड़ा उमड़ने पे सोचा |बहूँ न बहूँ क्या करूँ ये ही सोचा ||बहा तो कहेंगे आँख बह गई हैरुका तो लगेगा जहाँ रुक गई हैदुविधा है कैसी बहुत बाद सोचा ||दिया जो जला तो पतंगा भी आयाजलूं किन्तु उसका न मरना सुहायाजला ही न होता तो ठीक होता ||क़दमों के नीचे सांप
 
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प्यास लगी हो रुक रे मुसाफिर

प्यास लगी हो रुक रे मुसाफिर , यहाँ का पानी पीते जा |शायद है , तू हार चूका पर , आज की बाजी जीते जा ||कुछ बंद पड़ा है तालों में , तुम याद न जग के ख्यालों मेंघोड़ों नरों खगधारों का , पानी गया पातालों मेंलौट पड़े न पड़े तू मेरी , व्यथा के प्याले पीता जा || शायद
 
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