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बोले तो...आज अपुन का डबल हैप्पी बर्डडे है

एक लम्बे अंतराल के बाद लिखने बैठा हूँ... आज एक वर्ष पूर्व १ फरवरी के ही दिन से अपनी व्यक्तिगत ३६वीं सूर्य परिक्रमा के प्रारंभ के साथ मैंने चिठ्ठाकारिता की शुरुआत की भी थी. आज जब चिठ्ठा-जगत में लिखते-पढ़ते (लिखते कम, पढ़ते ज्यादा) भूमिरथ पर बैठकर कर
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विदेशी बाबाओं और तांत्रिकों का खेल

आज थोडी देर पहले यह ख़बर पढ़ी कि ब्रिटेन में बसने वाले तांत्रिक, ओझाओं और बाबाओं की अब खैर नहीं और उनके विरूद्व कड़ी कार्यवाही की जायेगी। मन ने हर्ष से किसी उच्छृंखल मृग की तरह कुचालें भरनी शुरू कर दी कि चलिए भारतीयता और पुरातन शास्त्र के ज्ञानी होने के
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इस छोटे से बालक से कौन डरेगा

अप्रवासी जीवन की सबसे बड़ी असमंजस भरी बात होती हैं कि "साम दाम दंड भेद" किसी भी जुगत से अपने बच्चों को अपने व्याप्त देसीपन की घुट्टी कैसे परोसी जाए। इसी ध्येय से प्रेरित होकर हम अक्सर ही बच्चों को कुछ न कुछ भारतीय परोसते रहते हैं.... फ़िर चाहे वो भारतीय