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जिला अदालत, भोपाल 2010, 12 बजकर 5 मिनट!

मिटाने-जोड़ने का खेल [8 June 2010 | Read Comments | ] सुदीप्ति ♦ साहित्‍य, राजनीति, विज्ञान, कला आदि के इतिहास में छूट गये लोगों को क्‍या दर्ज कर लिये गये लोगों की कीमत पर ही जगह मिलेगी? Read the full story »जाति गिनना जरूरी [8 June 2010 |
 
अविनाश
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श्‍यामानंद जालान : वे नींव की ईंट की तरह बने रहेंगे

हंस से भी छुट्टी [26 May 2010 | Read Comments | ] डेस्‍क ♦ विवादास्‍पद सांस्‍कृतिक पत्रकार अजित राय हंस की गली से भी निकाल बाहर किये गये हैं। वे हंस के सांस्‍कृतिक प्रतिनिधि थे। ताजा अंक में उनका नाम नहीं है। Read the full story »पूछताछ या
 
अविनाश
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रामबिलास शर्मा… वह एक मशाल-सा कोई…

निरुपमा के जाने के बहुत बाद, जब गुबार थम जाए [22 May 2010 | Read Comments | ] दिलीप मंडल ♦ आने वाले दिनों में और कई निरुपमाओं की जान बचानी है तो उस वर्ण व्यवस्था की जड़ों को काटने की जरूरत है, जिसकी अंतर्वस्तु में ही हिंसा है। निरुपमा की हत्या
 
अविनाश
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कोडरमा के “खाप” में सारे सनातनी एक साथ

इस दुनिया में [20 May 2010 | Read Comments | ] विश्‍वदीपक ♦ साहित्य के नाम पर जो कूड़ा करकट पेश किया जा रहा, इसीलिए नहीं पढ़ा जा रहा है और इसीलिए मीडिया में उसे जगह भी नहीं मिल रही है। Read the full story »माओवादियों का लोकतंत्र [20 May 2010
 
अविनाश
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मुझे कुछ नहीं होगा… आइ लव यू रज्‍जन जी…

नीतीश की चापलूसी [12 May 2010 | Read Comments | ] प्रभात खबर ♦ मौर्य साम्राज्‍य के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्‍त रात में वेश बदल कर जनता के बीच जाते थे। जनता की पीड़ा जानने। कुछ वैसा ही नीतीश कर रहे हैं। Read the full story »पूछताछ का ड्रामा [12
 
अविनाश
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निरुपमा पाठक का ख़त, मां सुधा पाठक के नाम…

कठघरे में बरखा दत्त [10 May 2010 | Read Comments | ] आवेश तिवारी ♦ बरखा ने स्पेक्ट्रम घोटाले में अगर नीरा राडिया की मदद की, तो उसके पीछे सिर्फ उनका फायदा नहीं था, पूरे चैनल का हित उससे जुड़ा हुआ था। Read the full story »कुछ तो लोग कहेंगे [10
 
अविनाश
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जीवन के पक्ष में, मृत्यु के विरुद्ध : जंतर मंतर पर जुटान

जाति से डर क्‍यों? [08 May 2010 | Read Comments | ] नवीन ♦ मैं विनोद जी से पूछना चाहता हूं कि देश में जितने अंतरजातीय विवाह सन 90 से लेकर आज तक हुए हैं, क्या उनकी संख्या 1950 से 90 तक से कम है? Read the full story »प्रियभांशु पर लाल-पीले [08
 
अविनाश
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बेशर्म बिजनेस स्‍टैंडर्ड ने भी निरुपमा को नहीं बख्‍शा

सत्ता के ये दलाल [06 May 2010 | Read Comments | ] विश्‍वदीपक ♦ इन जैसे लोग अगर सेफ्टी वॉल्व की तरह काम नहीं करते तो नव उदारवादवाद की अंध समर्थक सरकार के लिए माओवादी सबसे बड़ा खतरा नहीं बनते। Read the full story »निरु हत्‍याकांड के सबक [06 May
 
अविनाश
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प्रेम में पड़ी उस स्त्री से अपना नाता था…

पंकज विष्‍ट की लंतरानी [04 May 2010 | Read Comments | ] आलोक श्रीवास्‍तव ♦ आपको कैसे पता कि किन किताबों पर रॉयल्टी दी जाती है, किन पर नहीं? क्या आपने इन प्रकाशनों से छपी किताब के बारे में तफ्तीश कर ली है? Read the full story »भागी हुई लड़कियां
 
अविनाश
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बिजनेस स्‍टैंडर्ड की पत्रकार ने झारखंड में फांसी लगायी

कठघरे में स्‍टार न्‍यूज [30 April 2010 | Read Comments | ] डेस्‍क ♦ दो बार सम्‍मन भेजे जाने के बाद भी स्‍टार न्‍यूज ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर सख्‍त हुए आयोग ने आज प्रबंधन को हाजिर होने का आदेश दिया है। Read the full story »पत्रकार पर एफआईआर
 
अविनाश
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चट्टान जो हथौड़े से चूर कर दी गई

1डेनिस ब्रुटुस के बारे में अमेरिकी खेल पत्रकार डेव ज़िरिन लिखते हैं- ही शेम्ड दि शेमलेस.1964 में तोक्यो में हुए ओलम्पिक खेलों से दक्षिण अफ्रीका की सहभागिता पर लगा प्रतिबन्ध ब्रुटुस द्वारा चलाई गई अंतर्राष्ट्रीय मुहिम का ही नतीजा था. एक सीधा-सादा सवाल
 
भारत भूषण तिवारी
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धरती तेज़ी से अपनी स्मृति खोती जा रही है - दिलीप चित्रे

आज सुबह कविमित्र तुषार धवल ने दिलीप जी के न रहने का दुखद समाचार दिया। अनुनाद परिवार उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनके निधन पर कवि पत्रकार राजकुमार केसवानी की बेहद भावशील त्वरित टिप्पणी आप उनके ब्लॉग पर यहाँ पढ़ सकते हैं। यहाँ प्रस्तुत है तुषार ध
 
शिरीष कुमार मौर्य
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कल रघुवीर सहाय का जन्मदिन है

आज फिर शुरू हुआ जीवन आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया आज एक छोटी-सी बच्ची आयी,किलक मेरे कन्धे चढ़ी आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया आज फिर जीवन शुरू हुआ। कल रघुवीर सहाय
 
शिरीष कुमार मौर्य
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ज्योत्स्ना शर्मा (११ मार्च १९६५-२३ दिसम्बर २००८ )

प्रस्तुति धीरेश सैनी ज्योत्स्ना शर्मा (११ मार्च १९६५-२३ दिसम्बर 2008) और उनके लेखन के बारे में साहित्य की दुनिया अनजान है। इसी महीने आये संबोधन के कविता विशेषांक में ज़रुर उनकी कुछ कवितायेँ छपी हैं। हम उनकी तीन अप्रकाशित कवितायें दे रहे हैं। उनके निध
 
शिरीष कुमार मौर्य