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स्त्रियां,जो मर्दवादी विमर्श से बाहर है

वर्चुअल स्पेस में मर्द लेखकों की एक ऐसी जमात है जो कि देश और दुनिया के तमाम मसलों पर लिखने का अधिकार रखते हैं। जाहिर है इन तमाम मसलों में स्त्रियां भी शामिल हैं। बल्कि स्त्रियों पर लिखते हुए अधिकार इतना अधिक है कि उनका लेखन विमर्श से कहीं ज्यादा
 
विनीत कुमार
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आम औरतों का इस ‘मुक्ति’ से कोई सरोकार नहीं है? गलत।

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-3- राजीव रंजन गिरिस्त्री होने भर से सबकी समस्याएं और हित एक नहीं हो जाते, मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार सबके लिए है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-2स्वप्न भी एक यथार्थ है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और
 
आर. अनुराधा
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स्त्री होने भर से सबकी समस्याएं और हित एक नहीं हो जाते, मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार सबके लिए है

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-2-राजीव रंजन गिरिस्वप्न भी एक यथार्थ है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1 में एक कविता के बहाने से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की स्थिति और मुक्ति के लिए खतरा मोल लेकर 'अपनी गर्दन ऐंठने तक खूंटा
 
आर. अनुराधा
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स्वप्न भी एक शुरुआत है

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1-राजीव रंजन गिरिपटना से छपने वाली पत्रिका 'वर्तमान संदर्भ' ने अपना अगस्त 2009 अंक 'स्त्री मुक्ति: यथार्थ और यूटोपिया'पर केंद्रित किया है। संपादक संगीता आनंद 'बातें तेरी मेरी' में लिखती हैं- "जो स्त्री-अस्मिता और
 
आर. अनुराधा