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क्या किसी के कहने से मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ?.......................घुघूती बासूती

परसों की मेरी पोस्ट पर एक युवा मित्र ने मुझे सुझाव दिया है कि मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ। उनका कहना है कि स्त्रियों को लेकर मेरी कलम एक तरफ ही चलती है। उनका सुझाव है कि मुझे स्त्रियों के शरीर को अधिक ढकने के लिए कुछ करना चाहिए। गर्मी की भरी दुपहरी उनके
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क्या आपने कभी सुना है.........घुघूती बासूती

क्या आपने कभी सुना है कि किसी माता पिता ने अपनी प्रतिष्ठा/सम्मान के लिए अपने......१. गंजेड़ी, नशेड़ी पुत्र की हत्या कर दी?२.बलात्कारी पुत्र की हत्या कर दी?३.देशद्रोही पुत्र की हत्या कर दी?४.आतंकवादी पुत्र की हत्या कर दी?५.हत्यारे पुत्र की हत्या कर
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मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद

राजकिशोरमानववाद का ठीक-ठीक अर्थ क्या है, मैं नहीं जानता। इसे लेकर मानववाद की धाराओं के बीच भी मतभेद है। इसलिए मानववाद को इस रूप में परिभाषित करना उपयोगी और निरापद, दोनों जान पड़ता है कि मनुष्यता ने जो कुछ भी श्रेष्ठ अर्जित किया है, वही मानववाद है। इससे
 
आर. अनुराधा
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सानिया प्रसंगः सानिया और उनके प्रशंसकों को उनका निर्णय मुबारक!...........घुघूती बासूती

सानिया वाले प्रसंग में जो कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण हो सकते हैं उनमें से कुछ ये हैं.....१.सानिया हम सबकी तरह स्वतन्त्र हैं किसी से भी विवाह करने या न करने के लिए।२.यह बात सभी मानते नहीं तो जानते हैं किन्तु जब बात पाकिस्तान की आती है तो हम मस्तिष्क से नहीं मन
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धर्म के बारे में खुले विचार का समय

धर्म के बारे में खुले विचार का समय वीरेन्द्र जैन्अभी हाल ही में अयोध्या के राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने महिलाओं को सलाह दी है कि महिलाओं को मन्दिरों और मठों में अकेले जाने की इज़ाज़त नहीं होनी चाहिए। उनके समर्थन में राम जन्म भूमि
 
वीरेन्द्र जैन
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एक टिप्पणी, एक लेख .....................घुघूती बासूती

इस लेख में बहुत कुछ जोड़ भी सकती हूँ किन्तु वह फिर कभी। यह बस यूँ ही नारी पर टिपियाते हुए (स्त्री के मन से अनायास निकला हुआ) कह दिया। जोड़ने को माँ के साथ हुए अनगिनित वाद विवाद व वार्ताएँ हैं, हजारों वे बातें हैं जो आज तक अनकही रह गईं। कहने पर उलाहने मिलने
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भारत में स्त्री की औकात

लीजिए बहनो और भाइयो, यदि आप किसी भ्रम में जी रहे थे तो तुरन्त उससे बाहर निकल आइए। यदि आप भारतीय नारी को महान मानने वालों का लिखा पढ़ते यह सोच रहे थे कि शायद आपका ही घर परिवार एक अपवाद है अन्यथा शेष भारत में तो जो वह कहे वही होता है, उसकी आज्ञा सबको
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नई नैतिकताओं पर विमर्श की ज़रूरतें

[यह लेख ‘अस्वीकृति में उठा हाथ’ श्रंखला में कुछ समय पूर्व लिखा गया था। महिला आरक्षण विधेयक पास हो जाने के बाद जो सामाजिक अंगड़ाई सम्भावित है उस सन्दर्भ में यह पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है।]नई नैतिकताओं पर विमर्श की जरूरतें ----------------- वीरेन्द्र जैन
 
वीरेन्द्र जैन
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महिला लीडरशिप शिखर सम्मेलन आरंभ

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर नई दिल्ली में तीन दिवसीय महिला लीडरशिप शिखर सम्मेलन सम्मेलन का आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन किया. बहुचर्चित महिला आरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए उन्होंने कहा कि सरकार महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और
 
Akanksha~आकांक्षा
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बुद्धू सा खड़ा मैं…।

  ब्लॉग जगत की हलचल से अलग रहते हुए अपनी सरकारी नौकरी बजाने में ही हलकान हो जाने पर मैने मन को समझा लिया कि इसमें बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऑफ़िस से लौटकर घर आने के बाद शर्ट की बटन खोलने के पहले कम्प्यूटर का बटन ऑन करने की आदत पड़ गयी थी। उसे
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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पुरुष जितना समय स्त्री के वस्त्रों, साज श्रृंगार व पहनावे पर सोचकर व्यर्थ करते हैं यदि अपने पहनावे व रखरखाव पर लगाएँ तो................घुघूती बासूती

तो.. स्वाभाविक है अधिक चुस्त,सुन्दर व स्वस्थ दिखेंगे व महसूस करेंगे। और सबसे बड़ी बात स्त्रियों को भी अधिक भाएँगे। भाएँगे केवल उपर्युक्त कारणों से ही नहीं अपितु अपने अखड़ूस व्यवहार के कारण भी। पुरुषों का एक बड़ा प्रतिशत स्त्रियों की चिन्ता में
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महिलाओं के सम्मान या गरिमा को कम करना उद्देश्य नहीं पर इन्हें भी तो जानिये

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें समूची पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया था। उसमें से एक शीर्षक को नाम दिया गया था ‘हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो जी लेते हैं।’ कुछ इसी तरह की बात हुई हमारी पिछली पोस्ट पर । भारतीय स्वाधीनता से सम्बंध
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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हाय रे तेरी किस्मत...

तीर्थयात्रा से लौटकर दुबारा कामकाज सम्हालने को जब मैने ऑफिस में प्रवेश किया तो पाया कि नये बॉस ने कदम रखते ही यहाँ रंग-रोगन लगवाकर, गमले रखवाकर, सुनहले अक्षरों में नामपट्टिका लगवाकर और ‘फेसलिफ्ट’ के दूसरे तमाम उपायों द्वारा यह संकेत दे दिया है कि अब
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बच के रहना रे बाबा... जाने कौन कैसा मिल जाय- भाग-२

इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इसका पूर्वार्द्ध जानना आवश्यक है। यदि आप पिछली पोस्ट न पढ़ पाये हों तो यहाँ चटका लगाएं...।) अब आगे...   जुलाई की ऊमस भरी गर्मी...। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों औ
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बच के रहना रे बाबा... जाने कौन कैसा मिल जाय !?!

मुझे तो अपने ही ऊपर तरस आ रही थी। कैसे यह सब सुनकर भी मैं उसके लिए कुछ खास नहीं कर पाया था। बेचारी कितनी हिम्मत करके आयी होगी अपना दुखड़ा सुनाने...। मैं अपने बॉस के पास उनके चैम्बर में बैठा कुछ सरकारी कामकाज पर विचार-विमर्श में तल्लीन था। मई का महीना.
 
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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एन्ग्लो वैदिकः लड़के एन्ग्लो, लड़कियाँ वैदिक ! एक परिवार में दो संस्कृतियों का मिलन।

वस्त्र कैसे हों? यह एक बहुत ही कठिन व निजी प्रश्न है और इसमें स्थान, जलवायु, आर्थिक स्थिति और उम्र भी बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे व्यक्ति विशेष पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर होता है। किन्तु जब लोग किसी संस्था से जुड़ते हैं तो संस्था को लगता है