स्वयं ही रणचंडी बनना होगा
स्वयं ही रणचंडी बनना होगा स्त्री के मन को इस देश में, कोई न समझ पाया है? कितना गहरा दर्द,तूफ़ान समेटे है, अपने गर्भ में,मस्तिष्क में, उसकी उर्वर जमीन में, बीज बोते समय तुमने न उसे खाद दी , न जल से सींचा, अपने रक्त की हर बूँद से, उसने उसे पोसा, असंख्य
Jan 07 2010 07:42 AM



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