पसंद करें
0
नापसंद करें

स्वयं ही रणचंडी बनना होगा

स्वयं ही रणचंडी बनना होगा स्त्री के मन को इस देश में, कोई न समझ पाया है? कितना गहरा दर्द,तूफ़ान समेटे है, अपने गर्भ में,मस्तिष्क में, उसकी उर्वर जमीन में, बीज बोते समय तुमने न उसे खाद दी , न जल से सींचा, अपने रक्त की हर बूँद से, उसने उसे पोसा, असंख्य
पसंद करें
2
नापसंद करें

अलविदा ज़िन्दगी

हम भी हरे थे,चुलबुले थे, ज़िन्दगी के हर रंग जिये थे आज हम मुरझा गये हैं दुख के बादल छा गये हैं। ज़िन्दगी की शाम में देगे नहीं कोई सदा हम, आखिरी लम्हें तो जी लें कल कहेंगे अलविदा हम। शिकवा नहीं कोई किसी से सबको भी आना यहीं हैं। आज जी भर कर विलस लो छोड
पसंद करें
0
नापसंद करें

माँ शारदे

शुभ्र-धवल,कमलासना, हंसवाहिनी,माँ शारदे। सप्त सुरों की साधिका, नमो नमामि,नमामि माँ॥ अन्तस में तेरा ही वास हो, वाणी [...]
पसंद करें
1
नापसंद करें

शून्य की यात्रा

शून्य! जीवन- यात्रा का आरंभ, जन्म जीवन का अवतरण, न भाषा,न सामर्थ्य, चलना, बोलना सब शून्य, माँ का दुग्ध-पान, तन-मन की शक्ति की वृद्धि, माँ की उंगली का सहारा, शिशु के शून्य [...]